Friday, 14 April 2017

किसानों को कैसे मिले ई-नाम का इनाम


आज से ठीक एक साल पहले 14 अप्रैल को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ईलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम की शुरुआत की थी। ई-नाम का उद्देश्य पूरे देश को एक मंडी के तौर पर स्थापित करना है, जिसमें देश के किसी भी एक हिस्से में बैठा कोई कारोबारी देश के किसी भी दूसरे हिस्से की मंडी में ले जाई जाने वाली किसान की उपज पर बोली लगा सकता है, उसे खरीद सकता है।

मोदी सरकार की इस पहल को आजादी के बाद से कृषि क्षेत्र में शुरू की गई सबसे बड़ी क्रांति माना जा सकता है क्योंकि इसकी सफलता से किसानों की आय बढ़ाने की राह में सबसे बड़ी मुश्किल का समाधान हो जाएगा। आइए पहले समझते हैं कि ई-नाम है क्या और यह कैसे काम करेगा और इसकी सफलता से क्या लक्ष्य हासिल हो सकेंगे? दरअसल मौजूदा व्यवस्था के तहत किसान अपने पास की (जिसकी दूरी 70-80 किलोमीटर तक भी हो सकती है) किसी भी मंडी में अपनी फसल लेकर जाता है और वहां अपने कमीशन एजेंट या आढ़तिये के पास अपनी उपज जमा कर देता है। इसके बाद आढ़तिया उसे नीलामी में उतारता है। मंडी के 4-5 कारोबार घेरा बनाकर खड़े होते हैं और हाथों में कमोडिटी को उठाकर एक अंदाजे से बोली लगाते हैं। फिर दो-तीन दूसरे कारोबारी उस पर क्रॉस बिड करते हैं और एक भाव तय कर सब कारोबारी दूसरे किसान की कमोडिटी की तरफ बढ़ जाते हैं। 

किसान के पास अधिकार होता है कि वह चाहे तो बोली की कीमत पर अपना अनाज न बेचे। लेकिन यह केवल सैद्धांतिक अधिकार है। व्यावहारिक तौर पर एक किसान के लिए वापस ट्रांसपोर्ट का खर्च देकर उपज घर ले जाना और अगले दिन फिर मंडी आना संभव नहीं होता क्योंकि अगले दिन भी बोली लगाने वाले वही कारोबार होते हैं और उपज की लागत इतनी बढ़ जाती है कि किसान को भारी नुकसान होना तय हो जाता है।

इन्हीं कारणों से मंडियों में एक कहावत चलती है कि यहां आने वाली उपज श्मशान जाने वाले मुर्दे की तरह है। एक बार जाने के बाद मुर्दा घर नहीं लौटता, उसे जलाना या दफनाना ही होता है। लेकिन केंद्र सरकार ने जिस ई-नाम पर एक साल पहले काम शुरू किया, उसमें 3 चरणों में काम होना है। पहले चरण मंडी पर ऑक्शन की पद्धति को पूरी तरह ऑनलाइन किया जा रहा है। यानी किसान जब मंडी में अपना माल लेकर आएगा, उसी समय उसे एक लॉट नंबर देकर उसके माल की एंट्री कर ली जाती है। इसमें लॉट नंबर के साथ उसकी मात्रा भी शामिल होती है और यह पूरी सूचना कम्प्यूटर स्क्रीन पर आ जाती है। 

दोपहर में एक नियत समय पर जब ऑक्शन शुरू होता है, तब सभी ट्रेडर सारे लॉट और उसकी मात्रा एक साथ स्क्रीन पर देखते हैं और उसी पर ऑक्शन होता है। वहां आप भाव तो देख सकते हैं, लेकिन कौन वो बोलियां लगा रहा है, इसकी जानकारी आपको नहीं मिलती। तो यह तो हुआ पहला चरण।
दूसरे चरण में एक राज्य की सभी मंडियों को एक दूसरे से जोड़ा जाएगा और राज्य के किसी भी शहर में बैठा कारोबारी दूसरे किसी भी शहर की मंडी में पहुंचे किसान के माल की बोली लगा सकेगा। और तीसरा और अंतिम चरण होगा, जब किसी भी राज्य का कारोबारी किसी भी दूसरे राज्य की किसी भी मंडी में किसी किसान का माल, उसकी मात्रा और भाव देख सकेगा और उस पर बोली लगा सकेगा।

सरकार ने पहले चरण में मार्च 2018 तक 585 मंडियों को ई-नाम के तहत लाने का फैसला किया है। 31 मार्च 2017 तक सरकार ने 400 मंडियों को इसके तहत लाने का लक्ष्य रखा था, जबकि 10 अप्रैल तक 417 मंडियां इसमें शामिल हो गई हैं। इन मंडियों में 39.5 लाख किसानों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया है और इसके जरिए अब तक 15,000 करोड़ रुपये के 59 लाख टन कमोडिटी का कारोबार हो चुका है।

यानी सरकार पहले चरण के तहत पूरी तरह ट्रैक पर है। लेकिन दूसरे और तीसरे चरण की राह आसान नहीं है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती मंडी में आने वाले माल का गुणवत्ता मानक तय करने की है। दरअसल हर कमोडिटी की कीमत निर्धारण में उसकी गुणवत्ता का सबसे बड़ा योगदान होता है। और इन मानकों में नमी, खर-पतवार, टूटे दाने इत्यादि की प्रतिशतता देखी जाती है। अब एक ही मंडी में तो कारोबारी माल हाथ में उठाकर देख लेता है और भाव लगा देता है, लेकिन दूर की मंडी के माल का भाव वह तब तक नहीं लगा सकता, अगर स्क्रीन पर माल के साथ उसके गुणवत्ता मानकों का विवरण न देख ले। और यह तब तक संभव नहीं है, जब तक इन सभी 585 मंडियों में आने वाले हर किसान के सारे माल की असेईंग, ग्रेडिंग और क्लिनिंग न की जा सके। यह आसान काम नहीं है। 

इसी उद्देश्य से वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के लिए पेश आम बजट में ई-नाम के तहत शामिल होने वाली हर मंडी के लिए मदद की रकम 30 लाख रुपये से बढ़ाकर 75 लाख रुपये कर दी है। इनमें 30 लाख रुपये असेईंग के लिए जरूरी कम्प्यूटर हार्डवेयर के लिए 40 लाख रुपये क्लीनिंग, ग्रेडिंग सुविधाएं विकसित करने के लिए और 5 लाख रुपये मंडी के वेस्ट से कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए खर्च किए जाएंगे। सभी मंडियों में यह सुविधा आने के बाद ही दूसरे और तीसरे चरण का काम पूरा होगा।

एक बार यह हो जाने के बाद, किसानों को बाजार सुनिश्चित करने और उन्हें अपने उपज का अच्छा भाव दिलाने के लिहाज से यह एक क्रांतिकारी घटना होगी। इससे एक तरफ तो छोटी से छोटी जगह के किसानों को भी पूरे देश के कारोबारियों की प्रतिस्पर्द्धी बोलियों का फायदा मिल सकेगा और दूसरी ओर पूरे देश में मांग और आपूर्ति की तस्वीर रियल टाइम बेसिस पर शीशे की तरह साफ रहेगी। इससे जहां एक ओर कालाबाजारी और जमाखोरी खत्म होगी, वहीं अनाज की कृत्रिम कमी भी तैयार नहीं की जा सकेगी।

राज्य सरकारों के लिए ई-नाम में शामिल होने से पहले अपने एपीएमसी एक्ट में संशोधन करना अनिवार्य शर्त है। फिलहाल सरकार ने 69 कमोडिटी को ई-नाम प्लेटफॉर्म पर शामिल किया है और 13 राज्यों ने एपीएमसी एक्ट में जरूरी संशोधन कर लिया है। 12 अप्रैल को केंद्र और राज्यों के कृषि अधिकारियों के बीच हुई बैठक में पश्चिम बंगाल और तामिलनाडु ने भी इस प्रक्रिया में जल्द से जल्द शामिल होने की इच्छा जताई है। यानी कुल मिलाकर केंद्र सरकार अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है और इसमें उसे मिलने वाली सफलता देश के किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के लिए एक शानदार खबर होगी।

Tuesday, 4 April 2017

कर्ज माफी से 2019 में बढ़ेगी यूपी में बीजेपी की चुनौतियां


उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी वादे को पूरा करते हुए राज्य के सभी लघु और सीमांत किसानों का 1 लाख रुपये तक का कर्ज माफ कर दिया है। इसके अलावा सरकार ने 7 लाख अन्य किसानों के एनपीए हो चुके यानी डूब चुके 5630 करोड़ रुपये का कर्ज भी पूरी तरह माफ करने का फैसला किया है। लघु और सीमांत किसानों के लिए की गई कर्ज माफी पर सरकार 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करेगी, जिससे इस पूरी परियोजना पर सरकार का खर्च 36,000 करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा होगा।

यह योगी सरकार का एक ऐसा फैसला था जो पहले से लगभग तय था और सबको इसका इंतजार था। लेकिन यह आसान सा फैसला लेने में योगी सरकार को शपथ लेने के बाद पूरे 15 दिन लग गए। और इस आसान से फैसले की मुश्किल कुछ ऐसी थी कि 324 विधायकों के साथ सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी पहली कैबिनेट बैठक तक के लिए 15 दिनों का इंतजार करना पड़ा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी वादे में पहली कैबिनेट बैठक में ही यह फैसला लेने का वचन दिया था। और विपक्ष ताक में बैठा था कि यदि पहली बैठक में यह फैसला न हो, तो राज्य ही नहीं, पूरे देश में बीजेपी की चमकदार यूपी विजय को धूमिल किया जा सके।
विपक्ष को मौका देना नहीं था और इसलिए घोषणा तो कैबिनेट की पहली बैठक में ही होनी थी। 

फिर इस आसान फैसले की मुश्किल क्या थी? मुश्किल यह थी कि एक राज्य के चुनाव में ये देश के प्रधानमंत्री का किया वादा था। तो जैसे ही यूपी में बीजेपी की सरकार बनी, महाराष्ट्र में विपक्ष की भूमिका निभा रहे सत्ता में सहयोगी शिवसेना के विधायकों ने हंगामा खड़ा कर दिया। यदि यूपी के चुनावों को मोदी कर्ज माफी का तोहफा दे सकते हैं, तो महाराष्ट्र के  किसानों को क्यों नहीं? और यदि केंद्र महाराष्ट्र की मांग मान ले तो फिर बाकी 27 राज्य भला क्योंकर चुप बैठने वाले थे। तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तुरंत बयान दिया कि कर्ज माफी राज्यों का विषय है और केंद्र की इसमें कोई भूमिका नहीं है।

साफ है कि अब इस चुनावी वादे को निभाने की पूरी जिम्मेदारी केवल योगी की थी और इस जिम्मेदारी की अर्थव्यवस्था इस आसान से फैसले को कठिन बना रही थी। इसलिए कि योगी सरकार पर 2019 से पहले राज्य के बुनियादी ढांचे से लेकर रोजगार तक के क्षेत्र में कुछ बड़ा कर दिखाने का भारी दबाव है और बिना फंड के यह हो नहीं सकता। तो किसानों की कर्ज माफी के साथ ही सरकारी खजाने को पंगु न होने देना राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

वादे और चुनौती के बीच रास्ता निकालते हुए ही राज्य सरकार ने 2008 में यूपीए सरकार की ओर से की गई कर्ज माफी की तर्ज पर सभी किसानों को इसका फायदा पहुंचाने के बजाय केवल लघु और सीमांत किसानों के 1 लाख रुपये तक का कर्ज माफ करने का फैसला किया है। अलबत्ता 16 फरवरी को हरदोई की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री मोदी ने जो वादा किया था, उसमें सभी किसानों के कर्ज माफी की बात थी, किसी खास वर्ग के किसानों की नहीं। 

ऐसे में संतुलन बनाने के लिए ऐसे किसानों के 5,630 करोड़ रुपये का कर्ज भी माफ करने का फैसला किया गया, जिन्होंने पहले ही उसकी किस्तें देना बंद कर दिया है और बैंकों की बैलेंस शीट में यह डूबे कर्ज की श्रेणी में जा चुका है
यूपी में 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल लगभग 6.58 करोड़ कामकाजी लोग हैं, जिनमें से 59 प्रतिशत यानी लगभग 3.88 करोड़ लोग खेती पर आश्रित हैं। इनमें से लगभग 2.33 करोड़ लोग किसान हैं, जिनके पास अपनी जमीन है। छोटे और सीमांत किसानों की संख्या इनमें 92 प्रतिशत यानी लगभग 2.15 करोड़ है, जिनके पास कुल खेतिहर जमीन के लिहाज से 45 प्रतिशत है। छोटे किसानों के पास औसत 1.4 हेक्टेयर और सीमांत किसानों के पास औसत 0.4 हेक्टेयर जमीन है।

उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज पिछले 4 सालों में दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। जहां 2012-13 में यह 31900 करोड़ रुपये था, वहीं 2014-15 में यह बढ़कर 55600 करोड़ रुपये हो गया। पूरे देश में 2015-16 और 2016-17 के दौरान कृषि कर्ज में हुई 15.3 प्रतिशत और 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी के हिसाब से माना जा सकता है 31 मार्च 2017 को खत्म हुए साल में यह कर्ज बढ़कर 69200 अरब रुपये तक पहुंच गया है। यह पूरा कर्ज माफ करने से राज्य सरकार पर पड़ने वाला बोझ संभालना मुश्किल हो सकता था। इसलिए सरकार ने बीच का रास्ता निकाला।
लेकिन यह बीच का रास्ता भी कई चुनौतियां लेकर आएगा। 

साल 2016-17 का उत्तर प्रदेश का बजट 3.46 लाख करोड़ रुपये का था। यानी वर्तमान फैसले से राज्य सरकार पर पूरे साल के बजट का 10 प्रतिशत से ज्यादा बोझ पड़ेगा। मिशन 2019 के लिहाज से यह रकम राज्य सरकार की तमाम भावी योजनाओं को पटरी से उतार सकती है क्योंकि सरकार ने एक तरफ तो इस साल जून तक हर सड़क को गड्ढा मुक्त करने जैसे लक्ष्य की घोषणा की है, वहीं 25 सितंबर 2018 तक हर गांव को बिजली देने का लक्ष्य भी रखा है। रोजगार एक अन्य मोर्चा है, जहां सरकार को बड़े परिणाम दिखाने होंगे और इसके लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश की भी जरूरत होगी।

यानी साफ है कि उत्तर प्रदेश के छोटे और सीमांत किसानों की कर्ज माफी के कैबिनेट के फैसले से भले ही बीजेपी ने अपना एक बड़ा चुनावी वादा पूरा कर दिया हो, लेकिन इसके साथ ही पार्टी ने दूसरे कई चुनावी वादों को अमली जामा पहनाने की अपनी चुनौती बढ़ा भी ली है।