उत्तर प्रदेश की योगी
आदित्यनाथ सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी वादे को पूरा करते हुए
राज्य के सभी लघु और सीमांत किसानों का 1 लाख रुपये तक का कर्ज माफ कर दिया है।
इसके अलावा सरकार ने 7 लाख अन्य किसानों के एनपीए हो चुके यानी डूब चुके 5630
करोड़ रुपये का कर्ज भी पूरी तरह माफ करने का फैसला किया है। लघु और सीमांत
किसानों के लिए की गई कर्ज माफी पर सरकार 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च
करेगी, जिससे इस पूरी परियोजना पर सरकार का खर्च 36,000 करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा
होगा।
यह योगी सरकार का एक ऐसा
फैसला था जो पहले से लगभग तय था और सबको इसका इंतजार था। लेकिन यह “आसान” सा फैसला लेने में योगी सरकार को शपथ लेने के बाद पूरे 15
दिन लग गए। और इस “आसान” से फैसले की मुश्किल कुछ ऐसी थी कि 324
विधायकों के साथ सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी पहली
कैबिनेट बैठक तक के लिए 15 दिनों का इंतजार करना पड़ा क्योंकि प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी वादे में पहली कैबिनेट बैठक में ही यह फैसला लेने का
वचन दिया था। और विपक्ष ताक में बैठा था कि यदि पहली बैठक में यह फैसला न हो, तो
राज्य ही नहीं, पूरे देश में बीजेपी की चमकदार यूपी विजय को धूमिल किया जा सके।
विपक्ष को मौका देना नहीं
था और इसलिए घोषणा तो कैबिनेट की पहली बैठक में ही होनी थी।
फिर इस “आसान” फैसले की मुश्किल क्या थी? मुश्किल यह थी कि एक राज्य के चुनाव में ये देश के प्रधानमंत्री
का किया वादा था। तो जैसे ही यूपी में बीजेपी की सरकार बनी, महाराष्ट्र में विपक्ष
की भूमिका निभा रहे सत्ता में सहयोगी शिवसेना के विधायकों ने हंगामा खड़ा कर दिया।
यदि यूपी के चुनावों को मोदी कर्ज माफी का तोहफा दे सकते हैं, तो महाराष्ट्र
के किसानों को क्यों नहीं? और यदि केंद्र महाराष्ट्र की मांग मान ले तो
फिर बाकी 27 राज्य भला क्योंकर चुप बैठने वाले थे। तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तुरंत बयान दिया कि
कर्ज माफी राज्यों का विषय है और केंद्र की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
साफ है कि अब इस चुनावी
वादे को निभाने की पूरी जिम्मेदारी केवल योगी की थी और इस जिम्मेदारी की
अर्थव्यवस्था इस “आसान” से फैसले को कठिन बना रही थी। इसलिए कि योगी सरकार पर 2019 से
पहले राज्य के बुनियादी ढांचे से लेकर रोजगार तक के क्षेत्र में कुछ बड़ा कर
दिखाने का भारी दबाव है और बिना फंड के यह हो नहीं सकता। तो किसानों की कर्ज माफी
के साथ ही सरकारी खजाने को पंगु न होने देना राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी
चुनौती है।
वादे और चुनौती के बीच
रास्ता निकालते हुए ही राज्य सरकार ने 2008
में यूपीए सरकार की ओर से की गई कर्ज माफी की तर्ज पर सभी किसानों को इसका फायदा
पहुंचाने के बजाय केवल लघु और सीमांत किसानों के 1 लाख रुपये तक का कर्ज माफ करने का फैसला किया है। अलबत्ता 16
फरवरी को हरदोई की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री मोदी ने जो वादा किया था, उसमें सभी
किसानों के कर्ज माफी की बात थी, किसी खास वर्ग के किसानों की नहीं।
ऐसे में
संतुलन बनाने के लिए ऐसे किसानों के 5,630 करोड़ रुपये का कर्ज भी माफ करने का
फैसला किया गया, जिन्होंने पहले ही उसकी किस्तें देना बंद कर दिया है और बैंकों की
बैलेंस शीट में यह डूबे कर्ज की श्रेणी में जा चुका है
यूपी में 2011 की जनगणना
के मुताबिक कुल लगभग 6.58 करोड़ कामकाजी लोग हैं, जिनमें से 59 प्रतिशत यानी लगभग
3.88 करोड़ लोग खेती पर आश्रित हैं। इनमें से लगभग 2.33 करोड़ लोग किसान हैं,
जिनके पास अपनी जमीन है। छोटे और सीमांत किसानों की संख्या इनमें 92 प्रतिशत यानी लगभग 2.15 करोड़ है, जिनके पास कुल खेतिहर
जमीन के लिहाज से 45 प्रतिशत है। छोटे किसानों के पास औसत 1.4 हेक्टेयर और सीमांत
किसानों के पास औसत 0.4 हेक्टेयर जमीन है।
उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज पिछले 4 सालों में दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। जहां 2012-13 में यह 31900 करोड़ रुपये था, वहीं 2014-15 में यह बढ़कर 55600 करोड़ रुपये हो गया। पूरे देश में 2015-16 और 2016-17 के दौरान कृषि कर्ज में हुई 15.3 प्रतिशत और 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी के हिसाब से माना जा सकता है 31 मार्च 2017 को खत्म हुए साल में यह कर्ज बढ़कर 69200 अरब रुपये तक पहुंच गया है। यह पूरा कर्ज माफ करने से राज्य सरकार पर पड़ने वाला बोझ संभालना मुश्किल हो सकता था। इसलिए सरकार ने बीच का रास्ता निकाला।
लेकिन यह बीच का रास्ता
भी कई चुनौतियां लेकर आएगा।
साल 2016-17 का उत्तर प्रदेश का बजट 3.46 लाख करोड़
रुपये का था। यानी वर्तमान फैसले से राज्य सरकार पर पूरे साल के बजट का 10 प्रतिशत
से ज्यादा बोझ पड़ेगा। मिशन 2019 के लिहाज से यह रकम राज्य सरकार की तमाम भावी योजनाओं
को पटरी से उतार सकती है क्योंकि सरकार ने एक तरफ तो इस साल जून तक हर सड़क को
गड्ढा मुक्त करने जैसे लक्ष्य की घोषणा की है, वहीं 25 सितंबर 2018 तक हर गांव को
बिजली देने का लक्ष्य भी रखा है। रोजगार एक अन्य मोर्चा है, जहां सरकार को बड़े
परिणाम दिखाने होंगे और इसके लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश की भी
जरूरत होगी।
यानी साफ है कि उत्तर
प्रदेश के छोटे और सीमांत किसानों की कर्ज माफी के कैबिनेट के फैसले से भले ही
बीजेपी ने अपना एक बड़ा चुनावी वादा पूरा कर दिया हो, लेकिन इसके साथ ही पार्टी ने
दूसरे कई चुनावी वादों को अमली जामा पहनाने की अपनी चुनौती बढ़ा भी ली है।
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