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Tuesday, 4 April 2017

कर्ज माफी से 2019 में बढ़ेगी यूपी में बीजेपी की चुनौतियां


उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी वादे को पूरा करते हुए राज्य के सभी लघु और सीमांत किसानों का 1 लाख रुपये तक का कर्ज माफ कर दिया है। इसके अलावा सरकार ने 7 लाख अन्य किसानों के एनपीए हो चुके यानी डूब चुके 5630 करोड़ रुपये का कर्ज भी पूरी तरह माफ करने का फैसला किया है। लघु और सीमांत किसानों के लिए की गई कर्ज माफी पर सरकार 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करेगी, जिससे इस पूरी परियोजना पर सरकार का खर्च 36,000 करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा होगा।

यह योगी सरकार का एक ऐसा फैसला था जो पहले से लगभग तय था और सबको इसका इंतजार था। लेकिन यह आसान सा फैसला लेने में योगी सरकार को शपथ लेने के बाद पूरे 15 दिन लग गए। और इस आसान से फैसले की मुश्किल कुछ ऐसी थी कि 324 विधायकों के साथ सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी पहली कैबिनेट बैठक तक के लिए 15 दिनों का इंतजार करना पड़ा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी वादे में पहली कैबिनेट बैठक में ही यह फैसला लेने का वचन दिया था। और विपक्ष ताक में बैठा था कि यदि पहली बैठक में यह फैसला न हो, तो राज्य ही नहीं, पूरे देश में बीजेपी की चमकदार यूपी विजय को धूमिल किया जा सके।
विपक्ष को मौका देना नहीं था और इसलिए घोषणा तो कैबिनेट की पहली बैठक में ही होनी थी। 

फिर इस आसान फैसले की मुश्किल क्या थी? मुश्किल यह थी कि एक राज्य के चुनाव में ये देश के प्रधानमंत्री का किया वादा था। तो जैसे ही यूपी में बीजेपी की सरकार बनी, महाराष्ट्र में विपक्ष की भूमिका निभा रहे सत्ता में सहयोगी शिवसेना के विधायकों ने हंगामा खड़ा कर दिया। यदि यूपी के चुनावों को मोदी कर्ज माफी का तोहफा दे सकते हैं, तो महाराष्ट्र के  किसानों को क्यों नहीं? और यदि केंद्र महाराष्ट्र की मांग मान ले तो फिर बाकी 27 राज्य भला क्योंकर चुप बैठने वाले थे। तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तुरंत बयान दिया कि कर्ज माफी राज्यों का विषय है और केंद्र की इसमें कोई भूमिका नहीं है।

साफ है कि अब इस चुनावी वादे को निभाने की पूरी जिम्मेदारी केवल योगी की थी और इस जिम्मेदारी की अर्थव्यवस्था इस आसान से फैसले को कठिन बना रही थी। इसलिए कि योगी सरकार पर 2019 से पहले राज्य के बुनियादी ढांचे से लेकर रोजगार तक के क्षेत्र में कुछ बड़ा कर दिखाने का भारी दबाव है और बिना फंड के यह हो नहीं सकता। तो किसानों की कर्ज माफी के साथ ही सरकारी खजाने को पंगु न होने देना राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

वादे और चुनौती के बीच रास्ता निकालते हुए ही राज्य सरकार ने 2008 में यूपीए सरकार की ओर से की गई कर्ज माफी की तर्ज पर सभी किसानों को इसका फायदा पहुंचाने के बजाय केवल लघु और सीमांत किसानों के 1 लाख रुपये तक का कर्ज माफ करने का फैसला किया है। अलबत्ता 16 फरवरी को हरदोई की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री मोदी ने जो वादा किया था, उसमें सभी किसानों के कर्ज माफी की बात थी, किसी खास वर्ग के किसानों की नहीं। 

ऐसे में संतुलन बनाने के लिए ऐसे किसानों के 5,630 करोड़ रुपये का कर्ज भी माफ करने का फैसला किया गया, जिन्होंने पहले ही उसकी किस्तें देना बंद कर दिया है और बैंकों की बैलेंस शीट में यह डूबे कर्ज की श्रेणी में जा चुका है
यूपी में 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल लगभग 6.58 करोड़ कामकाजी लोग हैं, जिनमें से 59 प्रतिशत यानी लगभग 3.88 करोड़ लोग खेती पर आश्रित हैं। इनमें से लगभग 2.33 करोड़ लोग किसान हैं, जिनके पास अपनी जमीन है। छोटे और सीमांत किसानों की संख्या इनमें 92 प्रतिशत यानी लगभग 2.15 करोड़ है, जिनके पास कुल खेतिहर जमीन के लिहाज से 45 प्रतिशत है। छोटे किसानों के पास औसत 1.4 हेक्टेयर और सीमांत किसानों के पास औसत 0.4 हेक्टेयर जमीन है।

उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज पिछले 4 सालों में दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। जहां 2012-13 में यह 31900 करोड़ रुपये था, वहीं 2014-15 में यह बढ़कर 55600 करोड़ रुपये हो गया। पूरे देश में 2015-16 और 2016-17 के दौरान कृषि कर्ज में हुई 15.3 प्रतिशत और 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी के हिसाब से माना जा सकता है 31 मार्च 2017 को खत्म हुए साल में यह कर्ज बढ़कर 69200 अरब रुपये तक पहुंच गया है। यह पूरा कर्ज माफ करने से राज्य सरकार पर पड़ने वाला बोझ संभालना मुश्किल हो सकता था। इसलिए सरकार ने बीच का रास्ता निकाला।
लेकिन यह बीच का रास्ता भी कई चुनौतियां लेकर आएगा। 

साल 2016-17 का उत्तर प्रदेश का बजट 3.46 लाख करोड़ रुपये का था। यानी वर्तमान फैसले से राज्य सरकार पर पूरे साल के बजट का 10 प्रतिशत से ज्यादा बोझ पड़ेगा। मिशन 2019 के लिहाज से यह रकम राज्य सरकार की तमाम भावी योजनाओं को पटरी से उतार सकती है क्योंकि सरकार ने एक तरफ तो इस साल जून तक हर सड़क को गड्ढा मुक्त करने जैसे लक्ष्य की घोषणा की है, वहीं 25 सितंबर 2018 तक हर गांव को बिजली देने का लक्ष्य भी रखा है। रोजगार एक अन्य मोर्चा है, जहां सरकार को बड़े परिणाम दिखाने होंगे और इसके लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश की भी जरूरत होगी।

यानी साफ है कि उत्तर प्रदेश के छोटे और सीमांत किसानों की कर्ज माफी के कैबिनेट के फैसले से भले ही बीजेपी ने अपना एक बड़ा चुनावी वादा पूरा कर दिया हो, लेकिन इसके साथ ही पार्टी ने दूसरे कई चुनावी वादों को अमली जामा पहनाने की अपनी चुनौती बढ़ा भी ली है।

Saturday, 25 March 2017

योगी के डंडे भर से नहीं सुधरेगी यूपी की तकदीर


एक ट्रेन में जाती किसी अकेली लड़की से बलात्कार किया जाता है और उसे एसिड पिला दिया जाता है। इस जघन्य कुकृत्य को करने वाले न तो कोई बहुत बड़े राजनीतिक रसूख वाले लोग हैं और न बहुत पैसे वाले। संपत्ति का विवाद था और उसमें बदला लेने के लिए हैवानियत की हद तक जाने वाला यह रास्ता चुना गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पीड़ित लड़की से मिलने अस्पताल गए, लड़की को मुफ्त इलाज के निर्देश दिए, 1 लाख रुपये की मदद दी और पुलिस को ताकीद की कि दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए। और चंद घंटों के भीतर इस घटना के लिए जिम्मेदार दोनों अपराधी पकड़ लिए गए।

योगी की सक्रियता काबिलेतारीफ है और उसकी तारीफ होनी भी चाहिए। लेकिन पूरी राष्ट्रीय मीडिया में इस घटना के विमर्श की जो दिशा है, वह वास्तव में शोचनीय है। चारों तरफ योगी-योगी का शोर मचा है। निश्चित तौर पर शपथ ग्रहण के बाद से योगी की सक्रियता और पूरे प्रशासन में मचा हड़कंप खबरों और इलेक्ट्रॉनिक विजुअल्स के लिहाज से आदर्श मसाला है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है और जिसे विमर्श के केंद्र में आना चाहिए।

20 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में रोज किसी न किसी तरह के अत्याचार का शिकार होने वाली आम महिलाओं की संख्या सैकड़ों में है। तो क्या उन सबको न्याय पाने के लिए योगी के निजी दौरे का इंतजार करना होगा? यह पहला बड़ा सवाल है। और दूसरा बड़ा सवाल है कि लगभग 3 दर्जन मंत्रालयों के स्वामी योगी आदित्यनाथ क्या हजारों पुलिस स्टेशनों, हजारों सरकारी अस्पतालों और लाखों सरकारी कार्यालयों में निजी दौरे कर मुख्यमंत्री के तौर पर अपने वृहत्तर दायित्वों का सही निर्वाह कर पाएंगे? और तीसरा और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या योगी के बाद फिर अखिलेश या मायावती की सरकार आने पर गरीब और मजलूम लड़कियां बलत्कृत होकर एसिड पीने का पैशाचिक कृत्य झेलती रहेंगी।

दरअसल ताजा हालत पर मीडिया और समाज का विमर्श हीरोइज्म के प्रति हम भारतीयों की वाव फीलिंग का स्वाभाविक नतीजा है। हमारे अचेतन में यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत का संदेश इतना गहरे पैठ चुका है कि हम मान लेते हैं कि इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था, यहां के न्यायिक और पुलिसिया तंत्र का कुछ हो तो सकता नहीं है, अलबत्ता कोई मोदी या कोई योगी आकर यदि कहीं, कोई फर्क पैदा कर रहा है, तो यही बहुत है। लेकिन यदि हम लोक-विमर्श की दिशा थोड़ी बदल सकें तो मोदी-योगी का यही युग व्यवस्था परिवर्तन का सर्वोत्तम अवसर है।

नए मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों द्वारा अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों में औचक निरीक्षण की परंपरा पुरानी है। बल्कि मुझे तो याद आता है कि करीब 25 साल पहले जब लालू यादव पहली बार सरकार में आए थे, तो यह उनके गवर्नेंस स्टाइल का अभिन्न हिस्सा था। औचक निरीक्षणों में पुलिस वालों, डॉक्टरों और शिक्षकों को निलंबित करना और फिर मीडिया में बयान देकर उन्होंने खूब वाहवही बटोरी थी। लेकिन उसके बाद 15 सालों के उनके शासन में जो हुआ, इतिहास उसका गवाह है। दरअसल एक तरह से देखा जाए तो औचक दौरे और सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का निलंबन एक शॉर्ट कट है, जिसमें आपको बिना कुछ किए अधिकतम मीडिया अटेंशन और लोगों की वाहवही मिल जाती है। लेकिन यह गवर्नेंस का स्टैंडर्ड तरीका नहीं हो सकता।

इसका मतलब यह भी नहीं कि योगी पिछले हफ्ते भर से जो कर रहे हैं, उसका महत्व नहीं है। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी सरकार ने प्रशासनिक अधिकार और आत्मसम्मान को जिस निचले स्तर तक पहुंचा दिया थे, उसे उठाने, उसमें आत्मविश्वास जगाने और झकझोरने के लिए पहले उसकी अथॉरिटी बहाल करना जरूरी था। लेकिन इसी बहाने योगी को प्रशासन के मनोविज्ञान के हकीकत का पोस्टमॉर्टम भी करने की जरूरत है। 

जिस गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ 25 सालों से रह रहे हैं, वहां मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार जाने की खबर भर से सड़कों के गड्ढ़े भरे जाने लगते हैं, वर्षों से बजबजा रहे नाले साफ होने लगते हैं, थानों और अस्पतालों की सफाई होने लगती है। क्या सचमुच इन कामों के लिए हर शहर से किसी को मुख्यमंत्री बनने की जरूरत है? क्या अब तक गोरखपुर की जनता को एक अच्छी सड़क, एक जवाबदेह नगर निगम और एक साफ-सुथरे अस्पताल का अधिकार नहीं था? और क्या कानपुर, बरेली, गाजीपुर, आगरा, मेरठ, चित्रकूट, झांसी, भदोही, बिजनौर, गोंडा और ऐसे सैकड़ों दूसरे शहरों के लोगों को कभी ये अधिकार नहीं मिल सकेगा क्योंकि उनके शहर का कोई व्यक्ति शायद कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकेगा?

यही असली सवाल है, जो मीडिया और लोकचर्चा में आना चाहिए। यही असली समाधान है, जो मोदी और योगी जैसे नेताओं को ढूंढना चाहिए। नहीं तो योगी का धमाल केवल चार दिन की चांदनी बन कर रह जाएगा और फिर अंधेरी रात के ढलने का बस इंतजार ही करना होगा।

Tuesday, 21 March 2017

संघ के लिए मोदी मॉडल से अहम है, योगी मॉडल की सफलता

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के पीछे समीकरण चाहे जो रहे हों, सच यही है कि योगी राज्य के नए मुख्यमंत्री हैं। योगी के राज्यारोहण के बाद बरखा दत्त ने ट्वीट किया कि फ्रिंज अब मेनस्ट्रीम बन गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी लगभग इन्हीं शब्दों में एक खबर की हेडलाइन लगाई कि जानिए कैसे फ्रिंज मेनस्ट्रीम बन गया। यानी 5 बार का सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का सबसे मजबूत और प्रभावी नेता फ्रिंज (अलग-थलग) है। क्यों

क्योंकि वह भगवा पहनता है और हिंदुत्व की बात करता है। दरअसल लेफ्ट और लिबरल बुद्धिजीवियों ने दशकों से अपने तंत्र का इस्तेमाल कर भारतीय जनमानस में यह बात बैठा दी है कि हिंदुत्व और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं। आश्चर्य यह है कि गुजरात में मोदी की सफलता, देश के आधे से ज्यादा भूभाग पर भारतीय जनता पार्टी के शासन और विकास पुरुष के तौर पर उभरी मोदी की छवि भी इस मान्यता को तोड़ नहीं सकी है।

इसका एक बड़ा कारण मोदी का अपना राजनीतिक विकास क्रम है। गोधरा त्रासदी के तुरंत बाद हुए दंगों में अपनी कथित भूमिका पर लगे आरोपों के कारण मोदी की छवि एक कट्टर हिंदू नेता की बनी जरूर, लेकिन मोदी ने अपनी ओर से कभी उस छवि को हवा नहीं दी। उलटा, गुजरात में उन्होंने तमाम हिंदूवादी संगठनों को लगभग खत्म कर दिया और हिंदू एजेंडा को दरकिनार करते हुए केवल और केवल विकास की अपनी छवि को मजबूत किया। 

यानी देश ने जब मोदी को समझना शुरू किया, उसके बाद कभी किसी ने हिंदू मोदी को नहीं देखा (स्कल कैप पहनने से इंकार करना 15 सालों में हुए एकमात्र अपवाद है)। नतीजा यह हुआ कि गुजरात भले भाजपा का गढ़ बन गया, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, सिक्किम और पूर्वोत्तर के तीन राज्यों तक में भले ही भाजपा एक राजनीतिक ताकत बन कर स्थापित हो गई, लेकिन हर जगह पार्टी हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर डिफेंसिव रही। इन सब बातों से यही बात साबित होती गई कि हिंदुत्व और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं क्योंकि स्वयं भाजपा को भी अपने को विकास परक साबित करने के लिए हिंदुत्व से पल्ला झाड़ना पड़ता है।

लेकिन भाजपा के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक एजेंडा केवल भाजपा के सत्ता हासिल करने से पूरा नहीं होता। संघ का एजेंडा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला रखने पर केंद्रित है, जहां आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिख सके। और इस स्वर्णिम काल का एक मूलभूत तत्व हिंदू समाज की एकता है, जिसके लक्ष्य के साथ डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 

लेकिन सच यह भी है संघ अपने इस उद्देश्य में आज भी आंशिक सफलता ही हासिल कर सका है। गुजरात समेत तमाम दूसरे राज्यों में भाजपा भी कहीं न कहीं जातीय समीकरणों के लिहाज से ही चुनावी बिसात बिछाती आई है। लेकिन पहली बार उत्तर प्रदेश ने पार्टी और संघ के रणनीतिकारों को एक ऐसा जनादेश थमाया, जिसमें जातियों का भेद खत्म हो गया और विरोधियों की भाषा में रिवर्स पोलराइजेशन हुआ यानी कुल मिलाकर भाजपा को मिलने वाले वोट हर जातीय समीकरण से ऊपर उठकर हिंदू के नाम पर पड़े।


उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए यह अद्भुत घटना है, जहां कोई हिंदू नहीं। यहां केवल ब्राह्णण, राजपूत, दलित, यादव, पिछड़े और दूसरी जातियां हैं। हिंदू समाज के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की रणनीति के साथ उभरी दलित और पिछड़ा राजनीति सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में ही सफल हुई। समाज के कमज़ोर वर्गों (दलितों, पिछड़ों, अति-पिछड़ों और दूसरी गैर-सवर्ण जातियों) के प्रति अत्याचार, उनकी बहू-बेटियों का तिरस्कार और शोषण और उनकी शादियों में घोड़ी चढ़ने जैसे मसलों पर मारपीट जैसी घटनाएं सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से ही सामने आती हैं। 

ऐसे में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सफलता न केवल हिंदुत्व और विकास की एकरूपता साबित करने के लिहाज से तुरूप का पत्ता साबित होगी, बल्कि हिंदू समाज को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक करने के लिहाज से भी संघ को एक आदर्श रेसिपी उपलब्ध कराएगा, जिसे देश के दूसरे हिस्सों में भी लागू किया जा सकेगा। संघ का पिछले 90 साल का इतिहास बताता है कि संघ के लिए केवल अपना लक्ष्य स्थिर है, बाकी समय के साथ संघ हर बदलाव करने के लिए तैयार है। इसलिए जिन लोगों को लगता है कि हिंदुत्व की इस प्रयोगशाला के सफल होने का मतलब मुसलमानों के लिए तबाही है, वो संघ के हिंदू राष्ट्र की उस परिकल्पना से परिचित नहीं हैं, जिसमें संघ यहूदियों और पारसियों जैसे मुट्ठी भर समुदायों को पूरा सम्मान और अधिकार देने को हिंदू समाज की गौरवमयी परंपरा का हिस्सा मानता है। 

तो, जाहिर है कि योगी भी मोदी की उसी परंपरा को आगे बढ़ाएंगे, जिसमें सबका साथ, सबका विकास ही राजनीति का नया मूलमंत्र होगा। योगी भी मोदी की ही तरह विकास को अपना यूएसपी बनाएंगे और अगर वह ऐसा करने में सफल रहे, तो उत्तर प्रदेश जिस सांस्कृतिक-राजनीतिक दौर का गवाह बनेगा, वह संघ के लिए हिंदुत्व की सच्ची प्रयोगशाला साबित होगा।