एक ट्रेन में जाती किसी अकेली लड़की से
बलात्कार किया जाता है और उसे एसिड पिला दिया जाता है। इस जघन्य कुकृत्य को करने
वाले न तो कोई बहुत बड़े राजनीतिक रसूख वाले लोग हैं और न बहुत पैसे वाले। संपत्ति
का विवाद था और उसमें बदला लेने के लिए हैवानियत की हद तक जाने वाला यह रास्ता
चुना गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पीड़ित लड़की से मिलने अस्पताल गए, लड़की को
मुफ्त इलाज के निर्देश दिए, 1 लाख रुपये की मदद दी और पुलिस को ताकीद की कि
दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए। और चंद घंटों के भीतर इस घटना के लिए
जिम्मेदार दोनों अपराधी पकड़ लिए गए।
योगी की सक्रियता काबिलेतारीफ है और उसकी तारीफ
होनी भी चाहिए। लेकिन पूरी राष्ट्रीय मीडिया में इस घटना के विमर्श की जो दिशा है,
वह वास्तव में शोचनीय है। चारों तरफ योगी-योगी का शोर मचा है। निश्चित तौर पर शपथ
ग्रहण के बाद से योगी की सक्रियता और पूरे प्रशासन में मचा हड़कंप खबरों और
इलेक्ट्रॉनिक विजुअल्स के लिहाज से आदर्श मसाला है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक
दूसरा पहलू भी है और जिसे विमर्श के केंद्र में आना चाहिए।
20 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश
में रोज किसी न किसी तरह के अत्याचार का शिकार होने वाली आम महिलाओं की संख्या
सैकड़ों में है। तो क्या उन सबको न्याय पाने के लिए योगी के निजी दौरे का इंतजार
करना होगा? यह पहला बड़ा सवाल है। और दूसरा बड़ा सवाल है
कि लगभग 3 दर्जन मंत्रालयों के स्वामी योगी आदित्यनाथ क्या हजारों पुलिस स्टेशनों,
हजारों सरकारी अस्पतालों और लाखों सरकारी कार्यालयों में निजी दौरे कर मुख्यमंत्री
के तौर पर अपने वृहत्तर दायित्वों का सही निर्वाह कर पाएंगे? और तीसरा और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या योगी के बाद फिर अखिलेश या मायावती
की सरकार आने पर गरीब और मजलूम लड़कियां बलत्कृत होकर एसिड पीने का पैशाचिक कृत्य
झेलती रहेंगी।
दरअसल ताजा हालत पर मीडिया और समाज का विमर्श हीरोइज्म
के प्रति हम भारतीयों की ‘वाव फीलिंग’ का स्वाभाविक नतीजा है। हमारे अचेतन में “यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत” का संदेश इतना गहरे पैठ चुका है कि हम मान
लेते हैं कि इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था, यहां के न्यायिक और पुलिसिया तंत्र का
कुछ हो तो सकता नहीं है, अलबत्ता कोई मोदी या कोई योगी आकर यदि कहीं, कोई फर्क
पैदा कर रहा है, तो यही बहुत है। लेकिन यदि हम लोक-विमर्श की दिशा थोड़ी बदल सकें
तो मोदी-योगी का यही युग व्यवस्था परिवर्तन का सर्वोत्तम अवसर है।
नए मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों द्वारा
अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों में औचक निरीक्षण की परंपरा पुरानी है। बल्कि मुझे तो
याद आता है कि करीब 25 साल पहले जब लालू यादव पहली बार सरकार में आए थे, तो यह
उनके गवर्नेंस स्टाइल का अभिन्न हिस्सा था। औचक निरीक्षणों में पुलिस वालों,
डॉक्टरों और शिक्षकों को निलंबित करना और फिर मीडिया में बयान देकर उन्होंने खूब
वाहवही बटोरी थी। लेकिन उसके बाद 15 सालों के उनके शासन में जो हुआ, इतिहास उसका
गवाह है। दरअसल एक तरह से देखा जाए तो औचक दौरे और सरकारी कर्मचारियों और
अधिकारियों का निलंबन एक शॉर्ट कट है, जिसमें आपको बिना कुछ किए अधिकतम मीडिया
अटेंशन और लोगों की वाहवही मिल जाती है। लेकिन यह गवर्नेंस का स्टैंडर्ड तरीका
नहीं हो सकता।
इसका मतलब यह भी नहीं कि योगी पिछले हफ्ते भर
से जो कर रहे हैं, उसका महत्व नहीं है। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी
सरकार ने प्रशासनिक अधिकार और आत्मसम्मान को जिस निचले स्तर तक पहुंचा दिया थे,
उसे उठाने, उसमें आत्मविश्वास जगाने और झकझोरने के लिए पहले उसकी अथॉरिटी बहाल
करना जरूरी था। लेकिन इसी बहाने योगी को प्रशासन के मनोविज्ञान के हकीकत का
पोस्टमॉर्टम भी करने की जरूरत है।
जिस गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ 25 सालों से रह
रहे हैं, वहां मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार जाने की खबर भर से सड़कों के
गड्ढ़े भरे जाने लगते हैं, वर्षों से बजबजा रहे नाले साफ होने लगते हैं, थानों और
अस्पतालों की सफाई होने लगती है। क्या सचमुच इन कामों के लिए हर शहर से किसी को
मुख्यमंत्री बनने की जरूरत है? क्या अब तक गोरखपुर की जनता को एक अच्छी सड़क,
एक जवाबदेह नगर निगम और एक साफ-सुथरे अस्पताल का अधिकार नहीं था? और क्या कानपुर, बरेली, गाजीपुर, आगरा, मेरठ, चित्रकूट, झांसी, भदोही, बिजनौर,
गोंडा और ऐसे सैकड़ों दूसरे शहरों के लोगों को कभी ये अधिकार नहीं मिल सकेगा
क्योंकि उनके शहर का कोई व्यक्ति शायद कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकेगा?
यही असली सवाल है, जो मीडिया और लोकचर्चा में
आना चाहिए। यही असली समाधान है, जो मोदी और योगी जैसे नेताओं को ढूंढना चाहिए।
नहीं तो योगी का धमाल केवल चार दिन की चांदनी बन कर रह जाएगा और फिर अंधेरी रात के
ढलने का बस इंतजार ही करना होगा।
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