Wednesday, 15 March 2017

ईवीएम को रो रहे नेता बैलेट बॉक्स के जिन्न को भूल गए हैं

तब मैं स्कूल-कॉलेज में था और कोई खास राजनीतिक समझदारी नहीं हुआ करती थी। हालांकि स्कूल के एक बिहारी किशोर की जो कम राजनीतिक समझदारी होती है, वह भी कई दूसरे राज्यों के वयस्कों से बेहतर होती है। तो इस लिहाज से नियमित अखबार पढ़ने और डीडी व बीबीसी के समाचार बुलेटिन सुनते-समझते राजनीति के कुछ सूत्र पकड़ने लगा था मैं। और उस समय क्योंकि बिहार में सभी राजनीतिक धाराओं पर अकेले लालू छाप राजनीति हावी थी, तो उसके गुणा-गणित पर मित्र manish से लंबी-गहरी चर्चा भी हुआ करती थी।

वो बैलेट पेपर का दौर था। लालू का पहला 5 साल खत्म हो चुका था और दूसरे के लिए मतदान हो रहे थे। नरेंद्र मोदी की राजनीति का उस समय तक पुंसवन संस्कार भी नहीं हुआ था, तो विकास भी राजनीति का मुद्दा हो सकता है, इसकी कल्पना नहीं थी। गली-मुहल्लों, चाय-समोसे के ठीयों और स्कूल-ऑफिसों की गपबाज़ी में होने वाली तमाम राजनीतिक चर्चाओं का मूल एक ही होता था- जातीय समीकरण और उपजातियों का गुणा-भाग। तो चर्चाओं, खबरों से एक बात निकल कर आने लगी थी कि लालू का शासन अपनी गुंडागर्दी, अराजकता और यादववाद के लिए बहुत बदनाम हो गया है और गैर-यादव पिछड़ी जातियां लालू के खिलाफ लामबंद होने लगी हैं। अगड़ी जातियां तो पहले ही लालू के "भूरा बाल साफ करो" वाले रवैये से बिदकी पड़ी थीं। तो मिलाजुला कर लालू को केवल "M-Y" समीकरण का वोट मिलता दिख रहा था।

चुनाव हुआ। हवा बन गई कि लालू हारने जा रहे हैं। लेकिन लालू निश्चिंत थे। वो 1995 का समय था, जब टी एन शेषण ने बूथ लूट और मतदान के दौरान होने वाली गड़बड़ियों पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी थी। लेकिन लालू फिर भी निश्चिंत थे। पत्रकारों ने उनसे पूछा तो उन्होंने लूंगी-बनियान में अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा- बक्सा खुलने दीजिए, जिन्न निकलेगा। फिर बक्सा खुला और सबने जिन्न निकलते देखा। सारे समीकरण ध्वस्त हो गये। बक्से पर बक्से खुलते गए और जिन्न निकलते गए। नतीजा, लालू को भारी बहुमत आया और उनकी फिर से ताजपोशी हुई।

लोगों को समझ नहीं आया कि जिन्न निकला कहां से। जिन गावों के बारे में कहा जा रहा था कि भाजपा, काँग्रेस या नीतीश के गढ़ थे, उन इलाकों के बक्से जब खुले तो लालू का जिन्न नाचने लगा। लोगों को जवाब मिला कुछ हफ्तों, महीनों के बाद। कई हफ्तों बाद राज्य के अलग-अलग हिस्सों से सैकड़ों बैलेट बॉक्स मिलने लगे। कभी तालाबों में, कभी झाड़ियों में और कभी जंगलों में। लेकिन लालू का जिन्न तो निकल ही चुका था और अपने आका का काम भी कर चुका था।

ईश्वर मायावती, केजरीवाल और कांग्रेस पार्टी को भी जिन्न का आशीर्वाद दें...

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