गोवा और मणिपुर दोनों में ही कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। तो ज़ाहिर है कि नैतिक और कानूनी, दोनों ही तौर पर कांग्रेस को दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने के लिए पहले आमंत्रित किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गोवा में तो राज्यपाल ने मनोहर पर्रिकर को शपथ लेने के लिए बुला ही लिया है, मणिपुर में भी संभावना है कि भाजपा को सरकार बनाने का मौक़ा दिया जाएगा।....
दरअसल दोनों ही राज्यों में राज्यपालों के पास इनके अलावा कोई दूसरा विकल्प था ही नहीं। क्योंकि न ही कांग्रेस और न ही भाजपा ने चुनाव पूर्व कोई गठबंधन किया था और ऐसी स्थिति में राज्यपाल केवल और केवल तभी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते या सकती हैं, अगर दोनों में से कोई भी पार्टी ज़रूरी 50 प्रतिशत विधायकों का समर्थन साबित न कर दे। लेकिन गोवा में चुनाव परिणामों के 24 घंटे के भीतर, जब दिग्विजय टीवी चैनलों को हताश-निराश चेहरे के साथ बाइट दे रहे थे, गडकरी-पर्रिकर ने 21 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र राज्यपाल के हाथों में दे दिया।
ऐसे में राज्यपाल अगर कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए बुलातीं, तो ये साफ तौर पर हॉर्स ट्रेडिंग यानी ख़रीद-फरोख़्त के लिए प्रोत्साहित देना था। क्योंकि जब तक दोनों ही बड़ी पार्टियां सत्ता से बाहर थीं, तब तक तो मैदान खुला था, लेकिन जैसे ही एक पार्टी अल्पमत के साथ सरकार बना लेती, तो बहुमत के लिए ख़रीद-फ़रोख्त करने की उसकी क्षमता कई गुना बढ़ जाती। और ऐसे में जब भाजपा ने 21 विधायकों के समर्थन वाला पत्र राज्यपाल मृदुला सिन्हा को थमा दिया, तो फिर उनके पास पर्रिकर को शपथ के लिए आमंत्रित करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।....
दूसरी ओर मणिपुर का परिदृश्य है, जहां चुनाव परिणाम आने के 12 घंटे के भीतर कांग्रेस-भाजपा के अलावा 4-4 सीट पाने वाली दोनों स्थानीय पार्टियों ने घोषणा कर दी कि वे कांग्रेस को समर्थन नहीं करने वाली। तीसरी छोटी पार्टी रामविलास पासवान की लोजपा है, जो केंद्र की एनडीए सरकार का हिस्सा है। तो ज़ाहिर है कि यहां भी सत्ता समीकरण पूरी तरह भाजपा के पक्ष में दिखने लगा और पार्टी ने अपना दावा भी ठोक दिया। तब तक मुख्यमंत्री इबोबी अजीब सी असंवैधानिक हरकत शुरू कर चुके थे। अगर यूपी में सपा-कांग्रेस को 325 सीटें आई होतीं, तो भी अखिलेश को तो इस्तीफा देना ही होता। अलबत्ता उन्हें फिर से विधायक दल का नेता चुना जाता, ये अलग बात है।
लेकिन विधानसभा में अपना बहुमत नहीं होने से घबराए इबोबी की हालत ऐसी हो गई कि उन्होंने बहुमत का दावा करते हुए इस्तीफा देने से ही इंकार कर दिया। साफ है कि बहुमत का पलड़ा भाजपा की तरफ झुक गया था और कांग्रेस इसे समझ रही थी। ऐसे में राज्यपाल इसे न समझे, यह संभव नहीं था। भाजपा अपने सारे समर्थक विधायकों के साथ राज्यपाल से मिल चुकी थी और इबोबी उन्हीं में से कुछ के नाम देकर राज्यपाल से उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए।....
कुल मिलाकर जिन लोगों को लग रहा है कि भाजपा ख़रीद-फ़रोख्त कर दोनों जगहों पर सरकार बनाने जा रही है, उन्हें यह ज़रूर समझना चाहिए कि जब किसी एक पार्टी को बहुमत न आए और कोई भी चुनाव-पूर्व गठबंधन न हो, तो सबसे व्यावहारिक और ईमानदार विकल्प यही हो सकता है कि सत्ता में आने से पहले जो भी गठबंधन बहुमत में आ जाए, उसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए। क्योंकि एक बार कोई अल्पमत पक्ष सरकार में आ जाए, तो उसके लिए संसाधनों के लिहाज से बहुमत हासिल करना आसान होगा, बनिस्पत सत्ता से बाहर रहते हुए बहुमत जुटाने के।
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