Showing posts with label RSS. Show all posts
Showing posts with label RSS. Show all posts

Monday, 27 March 2017

भाजपा की हर जीत पर बढ़ता संघ की विश्वसनीयता का संकट


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बरसाना तहसील के तहसील प्रचारक मनीष कुमार उत्तर प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में हो रहे नकल को रोकने लिए उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के अभियान चलाने संबंधी बयान से उत्साहित होकर अपने इलाके के रामादेवी इंटर कॉलेज पहुंच गए। कैमरा लिया और लगे दो होमगार्ड जवानों का वीडियो बनाने, जो इंटर में फिजिक्स की परीक्षा के दौरान नकल करा रहे थे। फिर क्या था, होमगार्ड जवानों ने आव देखा न ताव, मनीष कुमार पर पिल पड़े। डंडों से पिटे मनीष कुमार बाद में संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ थाने पहुंचे, तो होमगार्ड शेरपाल और धनेश के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया गया। उन्हें जेल भेजने के आश्वासन के साथ निलंबित कर दिया गया।
लेकिन क्लाईमैक्स अभी बाकी था और वह तब आया जब स्वयं भाजपा के कुछ नेता संघ के कार्यकर्ताओं पर मामले को ज्यादा तूल न दिए जाने का दबाव बनाने लगे। कारण

दरअसल यह स्कूल एक भाजपा नेता का है और वह भाजपा नेता किसी मंत्री का करीबी बताया जा रहा है। भाजपा की तरफ से यही संघ के लिए संदेश है। संघ का प्रचारक चुनाव में संगठन को मोबिलाइज करे, कार्यकर्ताओं को अपने घर से अपना खाना खाकर, अपना तेल जलाकर, अपना काम नुकसान कर संगठन के हित में भाजपा के उम्मीदवार को जिताए और चुनाव खत्म होने के बाद चुपचाप शाखा लगाए। भाजपा के नेता सत्ता में आकर अपने स्कूलों में नकल कराएं, अपने पेट्रोल पंपों पर मिलावट करवाएं, अपने अस्पतालों में लोगों की जेबें काटें और मंगल मनाएं।

संघ के लिए यह खतरे की घंटी है। संघ हमेशा से दावा करता है कि राजनीति से उसका कोई मतलब नहीं और वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। लेकिन सच सबको पता है। भाजपा का गर्भनाल संघ से जुड़ा है और अपने संगठन सचिवों और महासचिवों के जरिए संघ पार्टी के कार्यकलापों और नीतियों पर नियंत्रण भी रखने की कोशिश करता है। पिछले दशक तक संघ के प्रचारक, जिन्हें संगठन की कमान दी जाती थी, सत्ता में भागीदार नहीं बनते थे और सरकार में कोई पद नहीं लेते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी से शुरू होकर अब इस परंपरा में कई नाम शामिल हो चुके हैं।
इससे बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि भाजपा पर संघ का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। उत्तराखंड में 19 साल तक प्रचारक रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत और उत्तर प्रदेश में मनोज सिन्हा का नाम लगभग फाइनल होने के बावजूद योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी ने इस अहसास को और गहरा किया है। लेकिन थोड़ा भीतर जाकर देखा जाए तो चीजें अलग दिखने लगती हैं। पिछले दो दशकों में जिस तरह भाजपा का सांगठनिक और पिछले एक दशक में जिस तरह इसकी सत्ता का विस्तार हुआ है, उसके लिहाज से संघ के लिए पार्टी पर नियंत्रण रखना एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौती समय के साथ बड़ी होती जा रही है।

पहले भाजपा के तमाम बड़े नेता संघ की पृष्ठभूमि से थे और इसलिए उनमें से लगभग हर एक की लगाम संघ के किसी न किसी बड़े अधिकारी के हाथ में होती थी। यह लगाम किसी ताकत या मोलभाव की नहीं, बल्कि नैतिक होती थी। क्योंकि भाजपा के इन बड़े नेताओं की सांगठनिक और वैचारिक परवरिश किसी न किसी प्रचारक की छत्रछाया में हुई होती थी, तो ये नेता उन प्रचारकों के सामने कुछ भी गलत करने या गलती जाहिर होने से डरते थे। लेकिन 2017 की भाजपा अलग है। 

संगठन और सरकार में ऐसे नेताओं की एक पूरी फौज है, जो चुनाव से महज कुछ दिनों, हफ्तों या महीनों पहले पार्टी में शामिल हुए और पार्टी या सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच गए। ये वे नेता हैं, जिन्होंने पूरी जिंदगी संघ को, उसकी विचारधारा को और उसके प्रचारकों को गालियां दी हैं। इनके मन में न संगठन के प्रति और न ही संघ के अधिकारियों के प्रति कोई सम्मान है। है तो बस डर। डर संघ की सांगठनिक ताकत का। यह बात संघ को भी समझ में आ गई है कि भाजपा पर निंयंत्रण बनाए रखने का एकमात्र तरीका पार्टी नेताओं को जीत में अपनी अपरिहार्यता साबित करते रहना है और इसीलिए हर चुनाव में संघ की भागीदारी और गहन होती हुई दिखती है।

लेकिन संघ की इस रणनीति के अपने खतरे भी हैं। जब भाजपा नेता के स्कूल में परीक्षा में चोरी रोकने के चक्कर में संघ का तहसील प्रचारक पिटता है और जब भाजपा के नेता संघ के कार्यकर्ताओं पर मामले को दबाने का दबाव बनाते हैं तो ये खतरा अपने पूरे जोरों पर मुखर हो जाता है। खबर यह भी है कि दिल्ली के एमसीडी चुनावों में संघ के कार्यकर्ता घर-घर जाकर यूपी की तर्ज पर प्रचार करने वाले हैं। इसमें किसी को संदेह नहीं कि दिल्ली के तीनों एमसीडी में भाजपा शासन का भ्रष्टतम चेहरा सामने आया है। 

संघ इसका मूक दर्शक बना रहा और अब फिर से भाजपा की जीत पक्की करने के लिए मैदान में उतरने की तैयारी में है। अगर यह सच है तो संघ को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके समर्थन और पसीने से बनी सरकार उसकी नीतियों, उसके मूल्यों और दर्शन पर चले। नहीं तो भाजपा तो सत्ता में आकर अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी, लेकिन भारत को एक गौरवमयी और आदर्श समाज देने का संघ का उद्देश्य ध्वस्त हो जाएगा।

Tuesday, 21 March 2017

संघ के लिए मोदी मॉडल से अहम है, योगी मॉडल की सफलता

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के पीछे समीकरण चाहे जो रहे हों, सच यही है कि योगी राज्य के नए मुख्यमंत्री हैं। योगी के राज्यारोहण के बाद बरखा दत्त ने ट्वीट किया कि फ्रिंज अब मेनस्ट्रीम बन गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी लगभग इन्हीं शब्दों में एक खबर की हेडलाइन लगाई कि जानिए कैसे फ्रिंज मेनस्ट्रीम बन गया। यानी 5 बार का सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का सबसे मजबूत और प्रभावी नेता फ्रिंज (अलग-थलग) है। क्यों

क्योंकि वह भगवा पहनता है और हिंदुत्व की बात करता है। दरअसल लेफ्ट और लिबरल बुद्धिजीवियों ने दशकों से अपने तंत्र का इस्तेमाल कर भारतीय जनमानस में यह बात बैठा दी है कि हिंदुत्व और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं। आश्चर्य यह है कि गुजरात में मोदी की सफलता, देश के आधे से ज्यादा भूभाग पर भारतीय जनता पार्टी के शासन और विकास पुरुष के तौर पर उभरी मोदी की छवि भी इस मान्यता को तोड़ नहीं सकी है।

इसका एक बड़ा कारण मोदी का अपना राजनीतिक विकास क्रम है। गोधरा त्रासदी के तुरंत बाद हुए दंगों में अपनी कथित भूमिका पर लगे आरोपों के कारण मोदी की छवि एक कट्टर हिंदू नेता की बनी जरूर, लेकिन मोदी ने अपनी ओर से कभी उस छवि को हवा नहीं दी। उलटा, गुजरात में उन्होंने तमाम हिंदूवादी संगठनों को लगभग खत्म कर दिया और हिंदू एजेंडा को दरकिनार करते हुए केवल और केवल विकास की अपनी छवि को मजबूत किया। 

यानी देश ने जब मोदी को समझना शुरू किया, उसके बाद कभी किसी ने हिंदू मोदी को नहीं देखा (स्कल कैप पहनने से इंकार करना 15 सालों में हुए एकमात्र अपवाद है)। नतीजा यह हुआ कि गुजरात भले भाजपा का गढ़ बन गया, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, सिक्किम और पूर्वोत्तर के तीन राज्यों तक में भले ही भाजपा एक राजनीतिक ताकत बन कर स्थापित हो गई, लेकिन हर जगह पार्टी हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर डिफेंसिव रही। इन सब बातों से यही बात साबित होती गई कि हिंदुत्व और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं क्योंकि स्वयं भाजपा को भी अपने को विकास परक साबित करने के लिए हिंदुत्व से पल्ला झाड़ना पड़ता है।

लेकिन भाजपा के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक एजेंडा केवल भाजपा के सत्ता हासिल करने से पूरा नहीं होता। संघ का एजेंडा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला रखने पर केंद्रित है, जहां आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिख सके। और इस स्वर्णिम काल का एक मूलभूत तत्व हिंदू समाज की एकता है, जिसके लक्ष्य के साथ डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 

लेकिन सच यह भी है संघ अपने इस उद्देश्य में आज भी आंशिक सफलता ही हासिल कर सका है। गुजरात समेत तमाम दूसरे राज्यों में भाजपा भी कहीं न कहीं जातीय समीकरणों के लिहाज से ही चुनावी बिसात बिछाती आई है। लेकिन पहली बार उत्तर प्रदेश ने पार्टी और संघ के रणनीतिकारों को एक ऐसा जनादेश थमाया, जिसमें जातियों का भेद खत्म हो गया और विरोधियों की भाषा में रिवर्स पोलराइजेशन हुआ यानी कुल मिलाकर भाजपा को मिलने वाले वोट हर जातीय समीकरण से ऊपर उठकर हिंदू के नाम पर पड़े।


उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए यह अद्भुत घटना है, जहां कोई हिंदू नहीं। यहां केवल ब्राह्णण, राजपूत, दलित, यादव, पिछड़े और दूसरी जातियां हैं। हिंदू समाज के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की रणनीति के साथ उभरी दलित और पिछड़ा राजनीति सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में ही सफल हुई। समाज के कमज़ोर वर्गों (दलितों, पिछड़ों, अति-पिछड़ों और दूसरी गैर-सवर्ण जातियों) के प्रति अत्याचार, उनकी बहू-बेटियों का तिरस्कार और शोषण और उनकी शादियों में घोड़ी चढ़ने जैसे मसलों पर मारपीट जैसी घटनाएं सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से ही सामने आती हैं। 

ऐसे में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सफलता न केवल हिंदुत्व और विकास की एकरूपता साबित करने के लिहाज से तुरूप का पत्ता साबित होगी, बल्कि हिंदू समाज को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक करने के लिहाज से भी संघ को एक आदर्श रेसिपी उपलब्ध कराएगा, जिसे देश के दूसरे हिस्सों में भी लागू किया जा सकेगा। संघ का पिछले 90 साल का इतिहास बताता है कि संघ के लिए केवल अपना लक्ष्य स्थिर है, बाकी समय के साथ संघ हर बदलाव करने के लिए तैयार है। इसलिए जिन लोगों को लगता है कि हिंदुत्व की इस प्रयोगशाला के सफल होने का मतलब मुसलमानों के लिए तबाही है, वो संघ के हिंदू राष्ट्र की उस परिकल्पना से परिचित नहीं हैं, जिसमें संघ यहूदियों और पारसियों जैसे मुट्ठी भर समुदायों को पूरा सम्मान और अधिकार देने को हिंदू समाज की गौरवमयी परंपरा का हिस्सा मानता है। 

तो, जाहिर है कि योगी भी मोदी की उसी परंपरा को आगे बढ़ाएंगे, जिसमें सबका साथ, सबका विकास ही राजनीति का नया मूलमंत्र होगा। योगी भी मोदी की ही तरह विकास को अपना यूएसपी बनाएंगे और अगर वह ऐसा करने में सफल रहे, तो उत्तर प्रदेश जिस सांस्कृतिक-राजनीतिक दौर का गवाह बनेगा, वह संघ के लिए हिंदुत्व की सच्ची प्रयोगशाला साबित होगा।