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Saturday, 11 March 2017

शर्मिला इरोम के 90 वोट

शर्मिला इरोम की छवि मेरे मन में हमेशा एक महान नायिका की रही है... हालांकि उनके मुद्दे से मैं कभी सहमत नहीं था... लेकिन उनका जीवट, उनकी इच्छाशक्ति और अपने लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण ने मुझे कभी किसी सार्वजनिक मंच पर उनके खिलाफ कुछ बोलने नहीं दिया...
फिर भी एक बात हमेशा खटकती रही कि शर्मिला को समर्थन करने वाले लोग बिना किसी अपवाद के वही लोग क्यों हैं जो नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के जवानों के मारे जाने पर जेएनयू में जश्न मनाते हैं, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक़ मानते हैं, और जो दिल्ली में बैठकर कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार की पैरोकारी करते हैं... इसके बावजूद देश की मीडिया में पूर्वोत्तर के प्रति उदासीनता को देखते हुए मैंने शर्मिला को संदेह का लाभ दिया और माना कि वो मणिपुर के लोगों की आवाज़ हैं और वहां की सिविल सोसायटी की भावनाओं का नेतृत्व कर रही हैं...
फिर उन्होंने डेढ़ दशक से ज़्यादा का अपना उपवास तोड़कर चुनाव लड़ने की घोषणा की और लगा कि चलो, अब कम से कम मणिपुर की जनता उनमें अपना भरोसा जताकर उनके संघर्ष को सम्मान देगी... लेकिन ये क्या!!! शर्मिला को 100 से भी कम वोट मिले... तो क्या लोकतंत्र हार गया या मणिपुर की जनता एहसानफरामोश निकली...
इसके उलट, मुझे लगता है कि इसीलिए भारतीय लोकतंत्र शानदार है... बड़े-बड़े राजाओं को भिखारियों की कतार में खड़ा देता है और बेबस-असहाय दिखने वालों को शेर बना देता है... शर्मिला को मिले 90-100 वोटों ने उनके पूरे आंदोलन का पर्सपेक्टिव बदल दिया है... इससे साबित हो गया है कि शर्मिला जनभावना से नहीं, स्वभावना से अपनी लड़ाई लड़ रही थीं... इन 90 वोटों से ये भी साबित हो गया है कि वे दरअसल मणिपुर की जनता का नहीं, बल्कि विदेश से फंडिंग पाने वाले एनजीओ और दिल्ली आधारित वामपंथी बुद्धिजीवियों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं... शायद इसीलिए उनको जितवाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके सलाहकार की भूमिका में थे... लेकिन मणिपुर कहीं नहीं था...
शर्मिला फेनोमेना ने ये भी साफ कर दिया है कि कश्मीर का नेता बने फिरने वाले गिलानी और मीर वाइज़ जैसे कभी चुनाव में उतरने का जोखिम क्यों नहीं लेते... क्योंकि जनता इनके मुलम्मे को अगर एक बार उतार देगी, तो न वे आईएसआई के किसी काम के रहेंगे और न भारत सरकार को धमका कर अय्याशी के लिए वसूली लायक...

निजी विचारों को पत्रकारिता का जामा मत पहनाइए हुज़ूर

लीजिए भाई, यूपी के नतीजे आ गए हैं... कई मित्र, जो फील्ड में घूम रहे थे, बीजेपी को 200 और ऊपर की सीटें बताने वालों को भक्त, बिकाऊ और पता नहीं क्या-क्या करार दे रहे थे... कुछ मित्र, जो बड़े मीडिया संस्थानों में काम करते हैं और ज़ाहिर है अपने को बड़ा पत्रकार मानते हैं और अपने नाम की ब्रांडिंग भी करने में पीछे नहीं रहते हैं, बीजेपी को तीसरे नंबर की पार्टी बता रहे थे और 120 और 80 सीट दे रहे थे...
वैसे तो इन मित्रों के पोस्ट और और आंकड़ेबाज़ी के स्क्रीन शॉट्स मैंने ले रखे हैं और पहले सोचा था कि लगाउंगा, लेकिन अब लगता है कि वो ज़्यादा पर्सनल हो जाएगा... लेकिन मैं उन मित्रों से एक ही बात कहना चाहता हूं कि आप बड़े मीडिया हाउस में हैं, केवल इसीलिए आप बड़े पत्रकार नहीं हो जाएंगे... पत्रकारिता के लिए विचार की ईमानदारी होनी पहली शर्त है...
और ये न कहिएगा कि ये केवल राजनीतिक आकलन का विषय था, जिसमें आप फेल हो गये... अगर सच में आप राज्य में घूम रहे थे, लोगों से बात कर रहे थे तो आपको 300 सीटों का आंकड़ा 80 या 120 नहीं दिख सकता था... बात सिर्फ इतनी है कि आप अपनी पत्रकारिता को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की मज़बूरी से बचा नहीं पा रहे हैं... तो आगे से जब आप अपने राजनीतिक विचार का कचरा फैलाएं, तो कृपया उसे पत्रकारिता की तश्तरी में न परोसें...