Tuesday, 14 March 2017

गोवा, मणिपुर में बीजेपी की सरकार कानूनी भी है और नैतिक भी

गोवा और मणिपुर दोनों में ही कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। तो ज़ाहिर है कि नैतिक और कानूनी, दोनों ही तौर पर कांग्रेस को दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने के लिए पहले आमंत्रित किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गोवा में तो राज्यपाल ने मनोहर पर्रिकर को शपथ लेने के लिए बुला ही लिया है, मणिपुर में भी संभावना है कि भाजपा को सरकार बनाने का मौक़ा दिया जाएगा।....
दरअसल दोनों ही राज्यों में राज्यपालों के पास इनके अलावा कोई दूसरा विकल्प था ही नहीं। क्योंकि न ही कांग्रेस और न ही भाजपा ने चुनाव पूर्व कोई गठबंधन किया था और ऐसी स्थिति में राज्यपाल केवल और केवल तभी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते या सकती हैं, अगर दोनों में से कोई भी पार्टी ज़रूरी 50 प्रतिशत विधायकों का समर्थन साबित न कर दे। लेकिन गोवा में चुनाव परिणामों के 24 घंटे के भीतर, जब दिग्विजय टीवी चैनलों को हताश-निराश चेहरे के साथ बाइट दे रहे थे, गडकरी-पर्रिकर ने 21 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र राज्यपाल के हाथों में दे दिया।
ऐसे में राज्यपाल अगर कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए बुलातीं, तो ये साफ तौर पर हॉर्स ट्रेडिंग यानी ख़रीद-फरोख़्त के लिए प्रोत्साहित देना था। क्योंकि जब तक दोनों ही बड़ी पार्टियां सत्ता से बाहर थीं, तब तक तो मैदान खुला था, लेकिन जैसे ही एक पार्टी अल्पमत के साथ सरकार बना लेती, तो बहुमत के लिए ख़रीद-फ़रोख्त करने की उसकी क्षमता कई गुना बढ़ जाती। और ऐसे में जब भाजपा ने 21 विधायकों के समर्थन वाला पत्र राज्यपाल मृदुला सिन्हा को थमा दिया, तो फिर उनके पास पर्रिकर को शपथ के लिए आमंत्रित करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।....
दूसरी ओर मणिपुर का परिदृश्य है, जहां चुनाव परिणाम आने के 12 घंटे के भीतर कांग्रेस-भाजपा के अलावा 4-4 सीट पाने वाली दोनों स्थानीय पार्टियों ने घोषणा कर दी कि वे कांग्रेस को समर्थन नहीं करने वाली। तीसरी छोटी पार्टी रामविलास पासवान की लोजपा है, जो केंद्र की एनडीए सरकार का हिस्सा है। तो ज़ाहिर है कि यहां भी सत्ता समीकरण पूरी तरह भाजपा के पक्ष में दिखने लगा और पार्टी ने अपना दावा भी ठोक दिया। तब तक मुख्यमंत्री इबोबी अजीब सी असंवैधानिक हरकत शुरू कर चुके थे। अगर यूपी में सपा-कांग्रेस को 325 सीटें आई होतीं, तो भी अखिलेश को तो इस्तीफा देना ही होता। अलबत्ता उन्हें फिर से विधायक दल का नेता चुना जाता, ये अलग बात है।
लेकिन विधानसभा में अपना बहुमत नहीं होने से घबराए इबोबी की हालत ऐसी हो गई कि उन्होंने बहुमत का दावा करते हुए इस्तीफा देने से ही इंकार कर दिया। साफ है कि बहुमत का पलड़ा भाजपा की तरफ झुक गया था और कांग्रेस इसे समझ रही थी। ऐसे में राज्यपाल इसे न समझे, यह संभव नहीं था। भाजपा अपने सारे समर्थक विधायकों के साथ राज्यपाल से मिल चुकी थी और इबोबी उन्हीं में से कुछ के नाम देकर राज्यपाल से उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए।....
कुल मिलाकर जिन लोगों को लग रहा है कि भाजपा ख़रीद-फ़रोख्त कर दोनों जगहों पर सरकार बनाने जा रही है, उन्हें यह ज़रूर समझना चाहिए कि जब किसी एक पार्टी को बहुमत न आए और कोई भी चुनाव-पूर्व गठबंधन न हो, तो सबसे व्यावहारिक और ईमानदार विकल्प यही हो सकता है कि सत्ता में आने से पहले जो भी गठबंधन बहुमत में आ जाए, उसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए। क्योंकि एक बार कोई अल्पमत पक्ष सरकार में आ जाए, तो उसके लिए संसाधनों के लिहाज से बहुमत हासिल करना आसान होगा, बनिस्पत सत्ता से बाहर रहते हुए बहुमत जुटाने के।

Saturday, 11 March 2017

शर्मिला इरोम के 90 वोट

शर्मिला इरोम की छवि मेरे मन में हमेशा एक महान नायिका की रही है... हालांकि उनके मुद्दे से मैं कभी सहमत नहीं था... लेकिन उनका जीवट, उनकी इच्छाशक्ति और अपने लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण ने मुझे कभी किसी सार्वजनिक मंच पर उनके खिलाफ कुछ बोलने नहीं दिया...
फिर भी एक बात हमेशा खटकती रही कि शर्मिला को समर्थन करने वाले लोग बिना किसी अपवाद के वही लोग क्यों हैं जो नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के जवानों के मारे जाने पर जेएनयू में जश्न मनाते हैं, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक़ मानते हैं, और जो दिल्ली में बैठकर कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार की पैरोकारी करते हैं... इसके बावजूद देश की मीडिया में पूर्वोत्तर के प्रति उदासीनता को देखते हुए मैंने शर्मिला को संदेह का लाभ दिया और माना कि वो मणिपुर के लोगों की आवाज़ हैं और वहां की सिविल सोसायटी की भावनाओं का नेतृत्व कर रही हैं...
फिर उन्होंने डेढ़ दशक से ज़्यादा का अपना उपवास तोड़कर चुनाव लड़ने की घोषणा की और लगा कि चलो, अब कम से कम मणिपुर की जनता उनमें अपना भरोसा जताकर उनके संघर्ष को सम्मान देगी... लेकिन ये क्या!!! शर्मिला को 100 से भी कम वोट मिले... तो क्या लोकतंत्र हार गया या मणिपुर की जनता एहसानफरामोश निकली...
इसके उलट, मुझे लगता है कि इसीलिए भारतीय लोकतंत्र शानदार है... बड़े-बड़े राजाओं को भिखारियों की कतार में खड़ा देता है और बेबस-असहाय दिखने वालों को शेर बना देता है... शर्मिला को मिले 90-100 वोटों ने उनके पूरे आंदोलन का पर्सपेक्टिव बदल दिया है... इससे साबित हो गया है कि शर्मिला जनभावना से नहीं, स्वभावना से अपनी लड़ाई लड़ रही थीं... इन 90 वोटों से ये भी साबित हो गया है कि वे दरअसल मणिपुर की जनता का नहीं, बल्कि विदेश से फंडिंग पाने वाले एनजीओ और दिल्ली आधारित वामपंथी बुद्धिजीवियों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं... शायद इसीलिए उनको जितवाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके सलाहकार की भूमिका में थे... लेकिन मणिपुर कहीं नहीं था...
शर्मिला फेनोमेना ने ये भी साफ कर दिया है कि कश्मीर का नेता बने फिरने वाले गिलानी और मीर वाइज़ जैसे कभी चुनाव में उतरने का जोखिम क्यों नहीं लेते... क्योंकि जनता इनके मुलम्मे को अगर एक बार उतार देगी, तो न वे आईएसआई के किसी काम के रहेंगे और न भारत सरकार को धमका कर अय्याशी के लिए वसूली लायक...

निजी विचारों को पत्रकारिता का जामा मत पहनाइए हुज़ूर

लीजिए भाई, यूपी के नतीजे आ गए हैं... कई मित्र, जो फील्ड में घूम रहे थे, बीजेपी को 200 और ऊपर की सीटें बताने वालों को भक्त, बिकाऊ और पता नहीं क्या-क्या करार दे रहे थे... कुछ मित्र, जो बड़े मीडिया संस्थानों में काम करते हैं और ज़ाहिर है अपने को बड़ा पत्रकार मानते हैं और अपने नाम की ब्रांडिंग भी करने में पीछे नहीं रहते हैं, बीजेपी को तीसरे नंबर की पार्टी बता रहे थे और 120 और 80 सीट दे रहे थे...
वैसे तो इन मित्रों के पोस्ट और और आंकड़ेबाज़ी के स्क्रीन शॉट्स मैंने ले रखे हैं और पहले सोचा था कि लगाउंगा, लेकिन अब लगता है कि वो ज़्यादा पर्सनल हो जाएगा... लेकिन मैं उन मित्रों से एक ही बात कहना चाहता हूं कि आप बड़े मीडिया हाउस में हैं, केवल इसीलिए आप बड़े पत्रकार नहीं हो जाएंगे... पत्रकारिता के लिए विचार की ईमानदारी होनी पहली शर्त है...
और ये न कहिएगा कि ये केवल राजनीतिक आकलन का विषय था, जिसमें आप फेल हो गये... अगर सच में आप राज्य में घूम रहे थे, लोगों से बात कर रहे थे तो आपको 300 सीटों का आंकड़ा 80 या 120 नहीं दिख सकता था... बात सिर्फ इतनी है कि आप अपनी पत्रकारिता को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की मज़बूरी से बचा नहीं पा रहे हैं... तो आगे से जब आप अपने राजनीतिक विचार का कचरा फैलाएं, तो कृपया उसे पत्रकारिता की तश्तरी में न परोसें...