Monday, 27 March 2017

भाजपा की हर जीत पर बढ़ता संघ की विश्वसनीयता का संकट


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बरसाना तहसील के तहसील प्रचारक मनीष कुमार उत्तर प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में हो रहे नकल को रोकने लिए उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के अभियान चलाने संबंधी बयान से उत्साहित होकर अपने इलाके के रामादेवी इंटर कॉलेज पहुंच गए। कैमरा लिया और लगे दो होमगार्ड जवानों का वीडियो बनाने, जो इंटर में फिजिक्स की परीक्षा के दौरान नकल करा रहे थे। फिर क्या था, होमगार्ड जवानों ने आव देखा न ताव, मनीष कुमार पर पिल पड़े। डंडों से पिटे मनीष कुमार बाद में संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ थाने पहुंचे, तो होमगार्ड शेरपाल और धनेश के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया गया। उन्हें जेल भेजने के आश्वासन के साथ निलंबित कर दिया गया।
लेकिन क्लाईमैक्स अभी बाकी था और वह तब आया जब स्वयं भाजपा के कुछ नेता संघ के कार्यकर्ताओं पर मामले को ज्यादा तूल न दिए जाने का दबाव बनाने लगे। कारण

दरअसल यह स्कूल एक भाजपा नेता का है और वह भाजपा नेता किसी मंत्री का करीबी बताया जा रहा है। भाजपा की तरफ से यही संघ के लिए संदेश है। संघ का प्रचारक चुनाव में संगठन को मोबिलाइज करे, कार्यकर्ताओं को अपने घर से अपना खाना खाकर, अपना तेल जलाकर, अपना काम नुकसान कर संगठन के हित में भाजपा के उम्मीदवार को जिताए और चुनाव खत्म होने के बाद चुपचाप शाखा लगाए। भाजपा के नेता सत्ता में आकर अपने स्कूलों में नकल कराएं, अपने पेट्रोल पंपों पर मिलावट करवाएं, अपने अस्पतालों में लोगों की जेबें काटें और मंगल मनाएं।

संघ के लिए यह खतरे की घंटी है। संघ हमेशा से दावा करता है कि राजनीति से उसका कोई मतलब नहीं और वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। लेकिन सच सबको पता है। भाजपा का गर्भनाल संघ से जुड़ा है और अपने संगठन सचिवों और महासचिवों के जरिए संघ पार्टी के कार्यकलापों और नीतियों पर नियंत्रण भी रखने की कोशिश करता है। पिछले दशक तक संघ के प्रचारक, जिन्हें संगठन की कमान दी जाती थी, सत्ता में भागीदार नहीं बनते थे और सरकार में कोई पद नहीं लेते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी से शुरू होकर अब इस परंपरा में कई नाम शामिल हो चुके हैं।
इससे बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि भाजपा पर संघ का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। उत्तराखंड में 19 साल तक प्रचारक रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत और उत्तर प्रदेश में मनोज सिन्हा का नाम लगभग फाइनल होने के बावजूद योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी ने इस अहसास को और गहरा किया है। लेकिन थोड़ा भीतर जाकर देखा जाए तो चीजें अलग दिखने लगती हैं। पिछले दो दशकों में जिस तरह भाजपा का सांगठनिक और पिछले एक दशक में जिस तरह इसकी सत्ता का विस्तार हुआ है, उसके लिहाज से संघ के लिए पार्टी पर नियंत्रण रखना एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौती समय के साथ बड़ी होती जा रही है।

पहले भाजपा के तमाम बड़े नेता संघ की पृष्ठभूमि से थे और इसलिए उनमें से लगभग हर एक की लगाम संघ के किसी न किसी बड़े अधिकारी के हाथ में होती थी। यह लगाम किसी ताकत या मोलभाव की नहीं, बल्कि नैतिक होती थी। क्योंकि भाजपा के इन बड़े नेताओं की सांगठनिक और वैचारिक परवरिश किसी न किसी प्रचारक की छत्रछाया में हुई होती थी, तो ये नेता उन प्रचारकों के सामने कुछ भी गलत करने या गलती जाहिर होने से डरते थे। लेकिन 2017 की भाजपा अलग है। 

संगठन और सरकार में ऐसे नेताओं की एक पूरी फौज है, जो चुनाव से महज कुछ दिनों, हफ्तों या महीनों पहले पार्टी में शामिल हुए और पार्टी या सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच गए। ये वे नेता हैं, जिन्होंने पूरी जिंदगी संघ को, उसकी विचारधारा को और उसके प्रचारकों को गालियां दी हैं। इनके मन में न संगठन के प्रति और न ही संघ के अधिकारियों के प्रति कोई सम्मान है। है तो बस डर। डर संघ की सांगठनिक ताकत का। यह बात संघ को भी समझ में आ गई है कि भाजपा पर निंयंत्रण बनाए रखने का एकमात्र तरीका पार्टी नेताओं को जीत में अपनी अपरिहार्यता साबित करते रहना है और इसीलिए हर चुनाव में संघ की भागीदारी और गहन होती हुई दिखती है।

लेकिन संघ की इस रणनीति के अपने खतरे भी हैं। जब भाजपा नेता के स्कूल में परीक्षा में चोरी रोकने के चक्कर में संघ का तहसील प्रचारक पिटता है और जब भाजपा के नेता संघ के कार्यकर्ताओं पर मामले को दबाने का दबाव बनाते हैं तो ये खतरा अपने पूरे जोरों पर मुखर हो जाता है। खबर यह भी है कि दिल्ली के एमसीडी चुनावों में संघ के कार्यकर्ता घर-घर जाकर यूपी की तर्ज पर प्रचार करने वाले हैं। इसमें किसी को संदेह नहीं कि दिल्ली के तीनों एमसीडी में भाजपा शासन का भ्रष्टतम चेहरा सामने आया है। 

संघ इसका मूक दर्शक बना रहा और अब फिर से भाजपा की जीत पक्की करने के लिए मैदान में उतरने की तैयारी में है। अगर यह सच है तो संघ को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके समर्थन और पसीने से बनी सरकार उसकी नीतियों, उसके मूल्यों और दर्शन पर चले। नहीं तो भाजपा तो सत्ता में आकर अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी, लेकिन भारत को एक गौरवमयी और आदर्श समाज देने का संघ का उद्देश्य ध्वस्त हो जाएगा।

Saturday, 25 March 2017

योगी के डंडे भर से नहीं सुधरेगी यूपी की तकदीर


एक ट्रेन में जाती किसी अकेली लड़की से बलात्कार किया जाता है और उसे एसिड पिला दिया जाता है। इस जघन्य कुकृत्य को करने वाले न तो कोई बहुत बड़े राजनीतिक रसूख वाले लोग हैं और न बहुत पैसे वाले। संपत्ति का विवाद था और उसमें बदला लेने के लिए हैवानियत की हद तक जाने वाला यह रास्ता चुना गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पीड़ित लड़की से मिलने अस्पताल गए, लड़की को मुफ्त इलाज के निर्देश दिए, 1 लाख रुपये की मदद दी और पुलिस को ताकीद की कि दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए। और चंद घंटों के भीतर इस घटना के लिए जिम्मेदार दोनों अपराधी पकड़ लिए गए।

योगी की सक्रियता काबिलेतारीफ है और उसकी तारीफ होनी भी चाहिए। लेकिन पूरी राष्ट्रीय मीडिया में इस घटना के विमर्श की जो दिशा है, वह वास्तव में शोचनीय है। चारों तरफ योगी-योगी का शोर मचा है। निश्चित तौर पर शपथ ग्रहण के बाद से योगी की सक्रियता और पूरे प्रशासन में मचा हड़कंप खबरों और इलेक्ट्रॉनिक विजुअल्स के लिहाज से आदर्श मसाला है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है और जिसे विमर्श के केंद्र में आना चाहिए।

20 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में रोज किसी न किसी तरह के अत्याचार का शिकार होने वाली आम महिलाओं की संख्या सैकड़ों में है। तो क्या उन सबको न्याय पाने के लिए योगी के निजी दौरे का इंतजार करना होगा? यह पहला बड़ा सवाल है। और दूसरा बड़ा सवाल है कि लगभग 3 दर्जन मंत्रालयों के स्वामी योगी आदित्यनाथ क्या हजारों पुलिस स्टेशनों, हजारों सरकारी अस्पतालों और लाखों सरकारी कार्यालयों में निजी दौरे कर मुख्यमंत्री के तौर पर अपने वृहत्तर दायित्वों का सही निर्वाह कर पाएंगे? और तीसरा और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या योगी के बाद फिर अखिलेश या मायावती की सरकार आने पर गरीब और मजलूम लड़कियां बलत्कृत होकर एसिड पीने का पैशाचिक कृत्य झेलती रहेंगी।

दरअसल ताजा हालत पर मीडिया और समाज का विमर्श हीरोइज्म के प्रति हम भारतीयों की वाव फीलिंग का स्वाभाविक नतीजा है। हमारे अचेतन में यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत का संदेश इतना गहरे पैठ चुका है कि हम मान लेते हैं कि इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था, यहां के न्यायिक और पुलिसिया तंत्र का कुछ हो तो सकता नहीं है, अलबत्ता कोई मोदी या कोई योगी आकर यदि कहीं, कोई फर्क पैदा कर रहा है, तो यही बहुत है। लेकिन यदि हम लोक-विमर्श की दिशा थोड़ी बदल सकें तो मोदी-योगी का यही युग व्यवस्था परिवर्तन का सर्वोत्तम अवसर है।

नए मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों द्वारा अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों में औचक निरीक्षण की परंपरा पुरानी है। बल्कि मुझे तो याद आता है कि करीब 25 साल पहले जब लालू यादव पहली बार सरकार में आए थे, तो यह उनके गवर्नेंस स्टाइल का अभिन्न हिस्सा था। औचक निरीक्षणों में पुलिस वालों, डॉक्टरों और शिक्षकों को निलंबित करना और फिर मीडिया में बयान देकर उन्होंने खूब वाहवही बटोरी थी। लेकिन उसके बाद 15 सालों के उनके शासन में जो हुआ, इतिहास उसका गवाह है। दरअसल एक तरह से देखा जाए तो औचक दौरे और सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का निलंबन एक शॉर्ट कट है, जिसमें आपको बिना कुछ किए अधिकतम मीडिया अटेंशन और लोगों की वाहवही मिल जाती है। लेकिन यह गवर्नेंस का स्टैंडर्ड तरीका नहीं हो सकता।

इसका मतलब यह भी नहीं कि योगी पिछले हफ्ते भर से जो कर रहे हैं, उसका महत्व नहीं है। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी सरकार ने प्रशासनिक अधिकार और आत्मसम्मान को जिस निचले स्तर तक पहुंचा दिया थे, उसे उठाने, उसमें आत्मविश्वास जगाने और झकझोरने के लिए पहले उसकी अथॉरिटी बहाल करना जरूरी था। लेकिन इसी बहाने योगी को प्रशासन के मनोविज्ञान के हकीकत का पोस्टमॉर्टम भी करने की जरूरत है। 

जिस गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ 25 सालों से रह रहे हैं, वहां मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार जाने की खबर भर से सड़कों के गड्ढ़े भरे जाने लगते हैं, वर्षों से बजबजा रहे नाले साफ होने लगते हैं, थानों और अस्पतालों की सफाई होने लगती है। क्या सचमुच इन कामों के लिए हर शहर से किसी को मुख्यमंत्री बनने की जरूरत है? क्या अब तक गोरखपुर की जनता को एक अच्छी सड़क, एक जवाबदेह नगर निगम और एक साफ-सुथरे अस्पताल का अधिकार नहीं था? और क्या कानपुर, बरेली, गाजीपुर, आगरा, मेरठ, चित्रकूट, झांसी, भदोही, बिजनौर, गोंडा और ऐसे सैकड़ों दूसरे शहरों के लोगों को कभी ये अधिकार नहीं मिल सकेगा क्योंकि उनके शहर का कोई व्यक्ति शायद कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकेगा?

यही असली सवाल है, जो मीडिया और लोकचर्चा में आना चाहिए। यही असली समाधान है, जो मोदी और योगी जैसे नेताओं को ढूंढना चाहिए। नहीं तो योगी का धमाल केवल चार दिन की चांदनी बन कर रह जाएगा और फिर अंधेरी रात के ढलने का बस इंतजार ही करना होगा।

Thursday, 23 March 2017

ममता लेफ्ट के मैदान में, दूसरे छोर पर बीजेपी का कब्जा


सुप्रीम कोर्ट के नारदा घोटाले की जांच सीबीआई को नहीं दिए जाने की मांग को ठुकराए जाने के बाद अब तय है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी की राजनीतिक लड़ाई और जोर पकड़ने वाली है। दरअसल 17,000 करोड़ रुपये के रोज वैली घोटाले की जांच सीबीआई पहले से कर रही है और पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी के दो सांसद तापस पाल और सुदीप बंद्योपाध्याय पहले से ही जेल में हैं। दूसरी तरफ बीजेपी के करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और राज्य स्तर के नेताओं पर पश्चिम बंगाल पुलिस ने आपराधिक मामले दर्ज किए हैं। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया है, कुछ और गिरफ्तार हो सकते हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो भी शामिल हैं, जिन पर टीएमसी की एक महिला कार्यकर्ता ने किसी टीवी शो के दौरान अश्लील हरकतें करने का आरोप लगाया है। रूपा गांगुली के ऊपर बच्चों की तस्करी का आरोप लगाया है और जांच चल रही है। इनके अलावा जिला और ब्लॉक स्तर पर भी करीब 150 ऐसे बीजेपी नेता हैं,  जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में इतिहास अपने आप को दुहरा रहा है। बस किरदार बदल गए हैं। लगभग एक दशक पहले तक राज्य की राजनीति में संघर्ष का प्रतीक मानी जाने वाली ममता बनर्जी अब सत्ता में हैं और लगभग ढाई दशकों तक सत्ता में रहने के बाद सीपीएम और दूसरी वामपंथी पार्टियां अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। दरअसल ममता ही राज्य में अब लेफ्ट की नई प्रतिनिधि हैं, इसलिए लेफ्ट को अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। ममता के सत्ता में जाने और लेफ्ट का पूरा सपोर्ट बेस ममता की ओर खिसकने के कारण विपक्ष का जो राजनीतिक स्थान खाली हुआ है, उसे पिछले कुछ सालों में बीजेपी तेजी से भर रही है।

वाम राजनीति के चरम पर पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल भी चरम पर था। नंदीग्राम और सिंगूर में हुए पुलिसिया अत्याचार अब भी रोएं खड़े करते हैं। विरोध के किसी भी स्वर को राज्य शक्ति से कुचलना वाम सरकार की रीति-नीति का हिस्सा था। इसी रीति-नीति ने ममता बनर्जी को एक ऐसी जुझारू नेता की छवि दी, गरीबों और मजबूरों की लड़ाई लड़ रही थी। विडंबना है कि सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने लगभग उन्हीं तरीकों को अपनाना शुरू किया है, जिन्हें उन्हें बंगाल की दीदी बनाया। नारदा चिट फंड घोटाले के संदर्भ में कोलकाता हाई कोर्ट की राज्य पुलिस पर की गई टिप्पणी इसका प्रमाण है। पार्टी लक्ष्यों के लिए पुलिसिया तंत्र के इस्तेमाल के अलावा कथित मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति भी एक ऐसा तत्व है, जिसे ममता बनर्जी ने सीधे वाम मोर्चे की सरकार से विरासत में हासिल कर लिया।

इनमें एक प्रमुख नीति बंगलादेशी घुसपैठियों को बढ़ावा देना और उन्हें राजनीतिक तौर पर हर सहूलियत मुहैया कराना था ताकि मुस्लिम वोट बैंक पर एकमुश्त कब्जा किया जा सके। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक 30 प्रतिशत से ज्यादा है। राज्य की 294 सीटों में से 100 से ज्यादा ऐसी हैं, जिन पर फैसला मुस्लिम वोट ही तय करता है। लेकिन पहले 25 साल की वाम राजनीति और अब ममता की नीतियों का नतीजा अब सामाजिक तौर पर दिखने लगा है, जहां कई गांवों में दुर्गा पूजा के जुलूस निकलने बंद कर दिए गए हैं। कई गांवों और मुहल्लों में शंख ध्वनि नहीं की जा सकती। और जनवरी 2016 में मालदा में हुई घटना, जिसमें 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या वाले कालियाचक में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने स्थानीय हिंदुओं पर हमला किया, के बाद जाहिर हुए तथ्यों से स्थिति का भयानकता अब जगजाहिर होने लगी है।

ममता के लेफ्ट की जगह लेने से खाली हुआ विपक्ष का स्थान, उनकी मुस्लिम नीतिओं के कारण हिंदुओं में बढ़ते असंतोष और मोदी के करिश्माई नेतृत्व के कारण हाल के वर्षों में बीजेपी तेजी से एक राजनीतिक ताकत बन कर उभरी है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को पहली बार 17 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 42 में से 2 सीटों पर जीत हासिल हुई। विधानसभा के लिहाज से देखें तो 2011 में पार्टी को मिले 4 प्रतिशत वोट बढ़कर 2016 में 10 प्रतिशत हो गए। 2016 में ही पं. बंगाल की दो लोकसभा सीटों, कूचबिहार और तामलुक में मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमें बीजेपी का वोट शेयर क्रमशः 16 से बढ़कर 29 प्रतिशत और 7 से बढ़कर 16 प्रतिशत कर पहुंच गया।

ममता को पता है कि उन्हें अगली चुनौती बीजेपी से ही मिलने जा रही है। इसलिए चाहे विमुद्रीकरण के खिलाफ मोदी के खिलाफ बिगुल फूंकना हो चाहे, 2019 में महागठबंधन बनाने में अगुवाई लेने का। ममता हर जगह आगे दिख रही हैं। लेकिन सवाल तो यह है कि जब भारतीय राजनीति के मूल कथानक बदल रहे हैं, मतदान के पैमाने और मतदाता ध्रुवीकरण के मानक बदल रहे हैं, तब अपनी मूलभूत राजनीतिक रणनीति में बदलाव किए बिना क्या ममता मोदी का तूफान रोक सकेंगी। अगले साल राज्य में होने वाले पंचायत चुनावों में इस सवाल का जवाब बहुत हद तक मिल जाएगा।

Tuesday, 21 March 2017

संघ के लिए मोदी मॉडल से अहम है, योगी मॉडल की सफलता

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के पीछे समीकरण चाहे जो रहे हों, सच यही है कि योगी राज्य के नए मुख्यमंत्री हैं। योगी के राज्यारोहण के बाद बरखा दत्त ने ट्वीट किया कि फ्रिंज अब मेनस्ट्रीम बन गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी लगभग इन्हीं शब्दों में एक खबर की हेडलाइन लगाई कि जानिए कैसे फ्रिंज मेनस्ट्रीम बन गया। यानी 5 बार का सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का सबसे मजबूत और प्रभावी नेता फ्रिंज (अलग-थलग) है। क्यों

क्योंकि वह भगवा पहनता है और हिंदुत्व की बात करता है। दरअसल लेफ्ट और लिबरल बुद्धिजीवियों ने दशकों से अपने तंत्र का इस्तेमाल कर भारतीय जनमानस में यह बात बैठा दी है कि हिंदुत्व और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं। आश्चर्य यह है कि गुजरात में मोदी की सफलता, देश के आधे से ज्यादा भूभाग पर भारतीय जनता पार्टी के शासन और विकास पुरुष के तौर पर उभरी मोदी की छवि भी इस मान्यता को तोड़ नहीं सकी है।

इसका एक बड़ा कारण मोदी का अपना राजनीतिक विकास क्रम है। गोधरा त्रासदी के तुरंत बाद हुए दंगों में अपनी कथित भूमिका पर लगे आरोपों के कारण मोदी की छवि एक कट्टर हिंदू नेता की बनी जरूर, लेकिन मोदी ने अपनी ओर से कभी उस छवि को हवा नहीं दी। उलटा, गुजरात में उन्होंने तमाम हिंदूवादी संगठनों को लगभग खत्म कर दिया और हिंदू एजेंडा को दरकिनार करते हुए केवल और केवल विकास की अपनी छवि को मजबूत किया। 

यानी देश ने जब मोदी को समझना शुरू किया, उसके बाद कभी किसी ने हिंदू मोदी को नहीं देखा (स्कल कैप पहनने से इंकार करना 15 सालों में हुए एकमात्र अपवाद है)। नतीजा यह हुआ कि गुजरात भले भाजपा का गढ़ बन गया, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, सिक्किम और पूर्वोत्तर के तीन राज्यों तक में भले ही भाजपा एक राजनीतिक ताकत बन कर स्थापित हो गई, लेकिन हर जगह पार्टी हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर डिफेंसिव रही। इन सब बातों से यही बात साबित होती गई कि हिंदुत्व और विकास एक-दूसरे के विरोधी हैं क्योंकि स्वयं भाजपा को भी अपने को विकास परक साबित करने के लिए हिंदुत्व से पल्ला झाड़ना पड़ता है।

लेकिन भाजपा के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक एजेंडा केवल भाजपा के सत्ता हासिल करने से पूरा नहीं होता। संघ का एजेंडा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला रखने पर केंद्रित है, जहां आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिख सके। और इस स्वर्णिम काल का एक मूलभूत तत्व हिंदू समाज की एकता है, जिसके लक्ष्य के साथ डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 

लेकिन सच यह भी है संघ अपने इस उद्देश्य में आज भी आंशिक सफलता ही हासिल कर सका है। गुजरात समेत तमाम दूसरे राज्यों में भाजपा भी कहीं न कहीं जातीय समीकरणों के लिहाज से ही चुनावी बिसात बिछाती आई है। लेकिन पहली बार उत्तर प्रदेश ने पार्टी और संघ के रणनीतिकारों को एक ऐसा जनादेश थमाया, जिसमें जातियों का भेद खत्म हो गया और विरोधियों की भाषा में रिवर्स पोलराइजेशन हुआ यानी कुल मिलाकर भाजपा को मिलने वाले वोट हर जातीय समीकरण से ऊपर उठकर हिंदू के नाम पर पड़े।


उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए यह अद्भुत घटना है, जहां कोई हिंदू नहीं। यहां केवल ब्राह्णण, राजपूत, दलित, यादव, पिछड़े और दूसरी जातियां हैं। हिंदू समाज के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की रणनीति के साथ उभरी दलित और पिछड़ा राजनीति सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में ही सफल हुई। समाज के कमज़ोर वर्गों (दलितों, पिछड़ों, अति-पिछड़ों और दूसरी गैर-सवर्ण जातियों) के प्रति अत्याचार, उनकी बहू-बेटियों का तिरस्कार और शोषण और उनकी शादियों में घोड़ी चढ़ने जैसे मसलों पर मारपीट जैसी घटनाएं सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से ही सामने आती हैं। 

ऐसे में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सफलता न केवल हिंदुत्व और विकास की एकरूपता साबित करने के लिहाज से तुरूप का पत्ता साबित होगी, बल्कि हिंदू समाज को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक करने के लिहाज से भी संघ को एक आदर्श रेसिपी उपलब्ध कराएगा, जिसे देश के दूसरे हिस्सों में भी लागू किया जा सकेगा। संघ का पिछले 90 साल का इतिहास बताता है कि संघ के लिए केवल अपना लक्ष्य स्थिर है, बाकी समय के साथ संघ हर बदलाव करने के लिए तैयार है। इसलिए जिन लोगों को लगता है कि हिंदुत्व की इस प्रयोगशाला के सफल होने का मतलब मुसलमानों के लिए तबाही है, वो संघ के हिंदू राष्ट्र की उस परिकल्पना से परिचित नहीं हैं, जिसमें संघ यहूदियों और पारसियों जैसे मुट्ठी भर समुदायों को पूरा सम्मान और अधिकार देने को हिंदू समाज की गौरवमयी परंपरा का हिस्सा मानता है। 

तो, जाहिर है कि योगी भी मोदी की उसी परंपरा को आगे बढ़ाएंगे, जिसमें सबका साथ, सबका विकास ही राजनीति का नया मूलमंत्र होगा। योगी भी मोदी की ही तरह विकास को अपना यूएसपी बनाएंगे और अगर वह ऐसा करने में सफल रहे, तो उत्तर प्रदेश जिस सांस्कृतिक-राजनीतिक दौर का गवाह बनेगा, वह संघ के लिए हिंदुत्व की सच्ची प्रयोगशाला साबित होगा।

Wednesday, 15 March 2017

ईवीएम को रो रहे नेता बैलेट बॉक्स के जिन्न को भूल गए हैं

तब मैं स्कूल-कॉलेज में था और कोई खास राजनीतिक समझदारी नहीं हुआ करती थी। हालांकि स्कूल के एक बिहारी किशोर की जो कम राजनीतिक समझदारी होती है, वह भी कई दूसरे राज्यों के वयस्कों से बेहतर होती है। तो इस लिहाज से नियमित अखबार पढ़ने और डीडी व बीबीसी के समाचार बुलेटिन सुनते-समझते राजनीति के कुछ सूत्र पकड़ने लगा था मैं। और उस समय क्योंकि बिहार में सभी राजनीतिक धाराओं पर अकेले लालू छाप राजनीति हावी थी, तो उसके गुणा-गणित पर मित्र manish से लंबी-गहरी चर्चा भी हुआ करती थी।

वो बैलेट पेपर का दौर था। लालू का पहला 5 साल खत्म हो चुका था और दूसरे के लिए मतदान हो रहे थे। नरेंद्र मोदी की राजनीति का उस समय तक पुंसवन संस्कार भी नहीं हुआ था, तो विकास भी राजनीति का मुद्दा हो सकता है, इसकी कल्पना नहीं थी। गली-मुहल्लों, चाय-समोसे के ठीयों और स्कूल-ऑफिसों की गपबाज़ी में होने वाली तमाम राजनीतिक चर्चाओं का मूल एक ही होता था- जातीय समीकरण और उपजातियों का गुणा-भाग। तो चर्चाओं, खबरों से एक बात निकल कर आने लगी थी कि लालू का शासन अपनी गुंडागर्दी, अराजकता और यादववाद के लिए बहुत बदनाम हो गया है और गैर-यादव पिछड़ी जातियां लालू के खिलाफ लामबंद होने लगी हैं। अगड़ी जातियां तो पहले ही लालू के "भूरा बाल साफ करो" वाले रवैये से बिदकी पड़ी थीं। तो मिलाजुला कर लालू को केवल "M-Y" समीकरण का वोट मिलता दिख रहा था।

चुनाव हुआ। हवा बन गई कि लालू हारने जा रहे हैं। लेकिन लालू निश्चिंत थे। वो 1995 का समय था, जब टी एन शेषण ने बूथ लूट और मतदान के दौरान होने वाली गड़बड़ियों पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी थी। लेकिन लालू फिर भी निश्चिंत थे। पत्रकारों ने उनसे पूछा तो उन्होंने लूंगी-बनियान में अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा- बक्सा खुलने दीजिए, जिन्न निकलेगा। फिर बक्सा खुला और सबने जिन्न निकलते देखा। सारे समीकरण ध्वस्त हो गये। बक्से पर बक्से खुलते गए और जिन्न निकलते गए। नतीजा, लालू को भारी बहुमत आया और उनकी फिर से ताजपोशी हुई।

लोगों को समझ नहीं आया कि जिन्न निकला कहां से। जिन गावों के बारे में कहा जा रहा था कि भाजपा, काँग्रेस या नीतीश के गढ़ थे, उन इलाकों के बक्से जब खुले तो लालू का जिन्न नाचने लगा। लोगों को जवाब मिला कुछ हफ्तों, महीनों के बाद। कई हफ्तों बाद राज्य के अलग-अलग हिस्सों से सैकड़ों बैलेट बॉक्स मिलने लगे। कभी तालाबों में, कभी झाड़ियों में और कभी जंगलों में। लेकिन लालू का जिन्न तो निकल ही चुका था और अपने आका का काम भी कर चुका था।

ईश्वर मायावती, केजरीवाल और कांग्रेस पार्टी को भी जिन्न का आशीर्वाद दें...

Tuesday, 14 March 2017

गोवा, मणिपुर में बीजेपी की सरकार कानूनी भी है और नैतिक भी

गोवा और मणिपुर दोनों में ही कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। तो ज़ाहिर है कि नैतिक और कानूनी, दोनों ही तौर पर कांग्रेस को दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने के लिए पहले आमंत्रित किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गोवा में तो राज्यपाल ने मनोहर पर्रिकर को शपथ लेने के लिए बुला ही लिया है, मणिपुर में भी संभावना है कि भाजपा को सरकार बनाने का मौक़ा दिया जाएगा।....
दरअसल दोनों ही राज्यों में राज्यपालों के पास इनके अलावा कोई दूसरा विकल्प था ही नहीं। क्योंकि न ही कांग्रेस और न ही भाजपा ने चुनाव पूर्व कोई गठबंधन किया था और ऐसी स्थिति में राज्यपाल केवल और केवल तभी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते या सकती हैं, अगर दोनों में से कोई भी पार्टी ज़रूरी 50 प्रतिशत विधायकों का समर्थन साबित न कर दे। लेकिन गोवा में चुनाव परिणामों के 24 घंटे के भीतर, जब दिग्विजय टीवी चैनलों को हताश-निराश चेहरे के साथ बाइट दे रहे थे, गडकरी-पर्रिकर ने 21 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र राज्यपाल के हाथों में दे दिया।
ऐसे में राज्यपाल अगर कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए बुलातीं, तो ये साफ तौर पर हॉर्स ट्रेडिंग यानी ख़रीद-फरोख़्त के लिए प्रोत्साहित देना था। क्योंकि जब तक दोनों ही बड़ी पार्टियां सत्ता से बाहर थीं, तब तक तो मैदान खुला था, लेकिन जैसे ही एक पार्टी अल्पमत के साथ सरकार बना लेती, तो बहुमत के लिए ख़रीद-फ़रोख्त करने की उसकी क्षमता कई गुना बढ़ जाती। और ऐसे में जब भाजपा ने 21 विधायकों के समर्थन वाला पत्र राज्यपाल मृदुला सिन्हा को थमा दिया, तो फिर उनके पास पर्रिकर को शपथ के लिए आमंत्रित करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।....
दूसरी ओर मणिपुर का परिदृश्य है, जहां चुनाव परिणाम आने के 12 घंटे के भीतर कांग्रेस-भाजपा के अलावा 4-4 सीट पाने वाली दोनों स्थानीय पार्टियों ने घोषणा कर दी कि वे कांग्रेस को समर्थन नहीं करने वाली। तीसरी छोटी पार्टी रामविलास पासवान की लोजपा है, जो केंद्र की एनडीए सरकार का हिस्सा है। तो ज़ाहिर है कि यहां भी सत्ता समीकरण पूरी तरह भाजपा के पक्ष में दिखने लगा और पार्टी ने अपना दावा भी ठोक दिया। तब तक मुख्यमंत्री इबोबी अजीब सी असंवैधानिक हरकत शुरू कर चुके थे। अगर यूपी में सपा-कांग्रेस को 325 सीटें आई होतीं, तो भी अखिलेश को तो इस्तीफा देना ही होता। अलबत्ता उन्हें फिर से विधायक दल का नेता चुना जाता, ये अलग बात है।
लेकिन विधानसभा में अपना बहुमत नहीं होने से घबराए इबोबी की हालत ऐसी हो गई कि उन्होंने बहुमत का दावा करते हुए इस्तीफा देने से ही इंकार कर दिया। साफ है कि बहुमत का पलड़ा भाजपा की तरफ झुक गया था और कांग्रेस इसे समझ रही थी। ऐसे में राज्यपाल इसे न समझे, यह संभव नहीं था। भाजपा अपने सारे समर्थक विधायकों के साथ राज्यपाल से मिल चुकी थी और इबोबी उन्हीं में से कुछ के नाम देकर राज्यपाल से उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए।....
कुल मिलाकर जिन लोगों को लग रहा है कि भाजपा ख़रीद-फ़रोख्त कर दोनों जगहों पर सरकार बनाने जा रही है, उन्हें यह ज़रूर समझना चाहिए कि जब किसी एक पार्टी को बहुमत न आए और कोई भी चुनाव-पूर्व गठबंधन न हो, तो सबसे व्यावहारिक और ईमानदार विकल्प यही हो सकता है कि सत्ता में आने से पहले जो भी गठबंधन बहुमत में आ जाए, उसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए। क्योंकि एक बार कोई अल्पमत पक्ष सरकार में आ जाए, तो उसके लिए संसाधनों के लिहाज से बहुमत हासिल करना आसान होगा, बनिस्पत सत्ता से बाहर रहते हुए बहुमत जुटाने के।

Saturday, 11 March 2017

शर्मिला इरोम के 90 वोट

शर्मिला इरोम की छवि मेरे मन में हमेशा एक महान नायिका की रही है... हालांकि उनके मुद्दे से मैं कभी सहमत नहीं था... लेकिन उनका जीवट, उनकी इच्छाशक्ति और अपने लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण ने मुझे कभी किसी सार्वजनिक मंच पर उनके खिलाफ कुछ बोलने नहीं दिया...
फिर भी एक बात हमेशा खटकती रही कि शर्मिला को समर्थन करने वाले लोग बिना किसी अपवाद के वही लोग क्यों हैं जो नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के जवानों के मारे जाने पर जेएनयू में जश्न मनाते हैं, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक़ मानते हैं, और जो दिल्ली में बैठकर कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार की पैरोकारी करते हैं... इसके बावजूद देश की मीडिया में पूर्वोत्तर के प्रति उदासीनता को देखते हुए मैंने शर्मिला को संदेह का लाभ दिया और माना कि वो मणिपुर के लोगों की आवाज़ हैं और वहां की सिविल सोसायटी की भावनाओं का नेतृत्व कर रही हैं...
फिर उन्होंने डेढ़ दशक से ज़्यादा का अपना उपवास तोड़कर चुनाव लड़ने की घोषणा की और लगा कि चलो, अब कम से कम मणिपुर की जनता उनमें अपना भरोसा जताकर उनके संघर्ष को सम्मान देगी... लेकिन ये क्या!!! शर्मिला को 100 से भी कम वोट मिले... तो क्या लोकतंत्र हार गया या मणिपुर की जनता एहसानफरामोश निकली...
इसके उलट, मुझे लगता है कि इसीलिए भारतीय लोकतंत्र शानदार है... बड़े-बड़े राजाओं को भिखारियों की कतार में खड़ा देता है और बेबस-असहाय दिखने वालों को शेर बना देता है... शर्मिला को मिले 90-100 वोटों ने उनके पूरे आंदोलन का पर्सपेक्टिव बदल दिया है... इससे साबित हो गया है कि शर्मिला जनभावना से नहीं, स्वभावना से अपनी लड़ाई लड़ रही थीं... इन 90 वोटों से ये भी साबित हो गया है कि वे दरअसल मणिपुर की जनता का नहीं, बल्कि विदेश से फंडिंग पाने वाले एनजीओ और दिल्ली आधारित वामपंथी बुद्धिजीवियों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं... शायद इसीलिए उनको जितवाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके सलाहकार की भूमिका में थे... लेकिन मणिपुर कहीं नहीं था...
शर्मिला फेनोमेना ने ये भी साफ कर दिया है कि कश्मीर का नेता बने फिरने वाले गिलानी और मीर वाइज़ जैसे कभी चुनाव में उतरने का जोखिम क्यों नहीं लेते... क्योंकि जनता इनके मुलम्मे को अगर एक बार उतार देगी, तो न वे आईएसआई के किसी काम के रहेंगे और न भारत सरकार को धमका कर अय्याशी के लिए वसूली लायक...

निजी विचारों को पत्रकारिता का जामा मत पहनाइए हुज़ूर

लीजिए भाई, यूपी के नतीजे आ गए हैं... कई मित्र, जो फील्ड में घूम रहे थे, बीजेपी को 200 और ऊपर की सीटें बताने वालों को भक्त, बिकाऊ और पता नहीं क्या-क्या करार दे रहे थे... कुछ मित्र, जो बड़े मीडिया संस्थानों में काम करते हैं और ज़ाहिर है अपने को बड़ा पत्रकार मानते हैं और अपने नाम की ब्रांडिंग भी करने में पीछे नहीं रहते हैं, बीजेपी को तीसरे नंबर की पार्टी बता रहे थे और 120 और 80 सीट दे रहे थे...
वैसे तो इन मित्रों के पोस्ट और और आंकड़ेबाज़ी के स्क्रीन शॉट्स मैंने ले रखे हैं और पहले सोचा था कि लगाउंगा, लेकिन अब लगता है कि वो ज़्यादा पर्सनल हो जाएगा... लेकिन मैं उन मित्रों से एक ही बात कहना चाहता हूं कि आप बड़े मीडिया हाउस में हैं, केवल इसीलिए आप बड़े पत्रकार नहीं हो जाएंगे... पत्रकारिता के लिए विचार की ईमानदारी होनी पहली शर्त है...
और ये न कहिएगा कि ये केवल राजनीतिक आकलन का विषय था, जिसमें आप फेल हो गये... अगर सच में आप राज्य में घूम रहे थे, लोगों से बात कर रहे थे तो आपको 300 सीटों का आंकड़ा 80 या 120 नहीं दिख सकता था... बात सिर्फ इतनी है कि आप अपनी पत्रकारिता को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की मज़बूरी से बचा नहीं पा रहे हैं... तो आगे से जब आप अपने राजनीतिक विचार का कचरा फैलाएं, तो कृपया उसे पत्रकारिता की तश्तरी में न परोसें...